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साबिर दत्त: चाँदनी रात में शानों से ढलकती चादर

साबिर दत्त: चाँदनी रात में शानों से ढलकती चादर
                
                                                                                 
                            चाँदनी रात में शानों से ढलकती चादर 
                                                                                                

जिस्म है या कोई शमशीर निकल आई है 

मुद्दतों बा'द उठाए थे पुराने काग़ज़ 
साथ तेरे मिरी तस्वीर निकल आई है 

कहकशाँ देख के अक्सर ये ख़याल आता है 
तेरी पाज़ेब से ज़ंजीर निकल आई है 

सेहन-ए-गुलशन में महकते हुए फूलों की क़तार 
तेरे ख़त से कोई तहरीर निकल आई है 

चाँद का रूप तो राँझे की नज़र माँगे है 
रेन-डोली से कोई हीर निकल आई है 
1 month ago

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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