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Urdu Ghazal: सलीम कौसर की ग़ज़ल- तुझ से बढ़ कर कोई प्यारा भी नहीं हो सकता

saleem kausar ghazal tujh se badh kar koi pyara bhi nahin ho sakta
                
                                                                                 
                            

तुझ से बढ़ कर कोई प्यारा भी नहीं हो सकता


पर तिरा साथ गवारा भी नहीं हो सकता

पाँव रखते हैं फिसल सकता है मिट्टी हो कि रेत
हर किनारा तो किनारा भी नहीं हो सकता

उस तक आवाज़ पहुँचनी भी बड़ी मुश्किल है
और न देखे तो इशारा भी नहीं हो सकता

तेरे बंदों की मईशत का अजब हाल हुआ
ऐश कैसा कि गुज़ारा भी नहीं हो सकता

अपना दुश्मन भी दिखाई नहीं देता हो जिसे
ऐसा लश्कर तो सफ़-आरा भी नहीं हो सकता

हुस्न ऐसा कि चका-चौंद हुई हैं आँखें
हैरत ऐसी कि नज़ारा भी नहीं हैं आँखें

वैसे वो शख़्स हमारा तो कभी था ही नहीं
दुख तो ये है कि तुम्हारा भी नहीं हो सकता

दुनिया अच्छी भी नहीं लगती हम जैसों को 'सलीम'
और दुनिया से किनारा भी नहीं हो सकता

1 month ago

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