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वसी शाह: तू मिल भी जाता तो आख़िर तुझे गँवा देते

wasi shah urdu ghazal dayaar e ghair mein kaise tujhe sadaa dete
                
                                                                                 
                            

दयार-ए-ग़ैर में कैसे तुझे सदा देते


तू मिल भी जाता तो आख़िर तुझे गँवा देते

तुम्ही ने हम को सुनाया न अपना दुख वर्ना
दुआ वो करते कि हम आसमाँ हिला देते

हमें ज़ो'म रहा कि अब वो पुकारेंगे
उन्हें ये ज़िद थी कि हर बार हम सदा देंगे

वो तेरा ग़म था कि तासीर मेरे लहजे की
कि जिस को हाल सुनाते वो रुला देते

तुम्हें भुलाना ही अव्वल तो दस्तरस में नहीं
जो इख़्तियार भी होता तो क्या भुला देते

तुम्हारी याद में कोई जवाब ही न दिया
मेरे ख़याल ही आँसू रहे सदा दे कर

हम अपने बच्चों से कैसे कहें कि ये गुड़िया
हमारे बस में जो होती तो दिला देते

समाअतों को मैं ता-उम्र कोसता 'सय्यद'
वो कुछ न कहते होंट तो हिला देते

तुम्हें भुलाना ही अव्वल तो दस्तरस में नहीं
जो इख़्तियार भी होता तो क्या भुला देते

1 month ago

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