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सोशल मीडिया: चलने से ठहरने को अलग नहीं किया जा सकता

सोशल मीडिया
                
                                                                                 
                            रास्ता कभी ख़त्म नहीं होता
                                                                                                

आग अपनी ही अग्नि में झुलसी
सूर्य अपने ही अंधकार में अस्त हुआ
आदमी अपनी छाया से कब मुक्त हो सका
इस संसार में जितना भी अंधेरा है
किसी अदृश्य की देह की छाया है।

प्यास के कंठ में है डूबकर मरी नदी का श्राप
रात में बिछड़े हुए लोगों की बेचैनी

चलने से ठहरने को अलग नहीं किया जा सकता
ठहरना एक खास तरह से चलना रहा है हमेशा से
पौधे एक खास मौसम में फूलते हैं
पेड़ एक खास ऋतु में फलते हैं
पेड़-पौधों में जो खास है वही फल और फूल बनता है
मौसम और ऋतु उनके सोकर जागने की बेला है। आगे पढ़ें

7 months ago

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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