वह राह दे कि जिसमें कोई हमसफ़र न हो: वसीम बरेलवी 

दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता: वसीम बरेलवी
                
                                                             
                            

शिकवा ही क्या,  कहीं यह नसीब - हुनर न हो
घर हो, तो बे - दिया हो, दिया हो ,तो घर न  हो 

कब से भटक  रहा हूं  मेरे  पा - ए - फ़िक्र  को
वह राह  दे कि  जिसमें  कोई  हमसफ़र  न हो

इस दौरे - तंग- दिल  में तरक्क़ी  के  नाम  पर
वह घर मिले कि  जिसमें हवा  का गुज़र न हो 

या   तेज़   आंधियों   पे    मुझे   इख़्तियार   दे
या वह  चराग़ दे , जिसे  बुझने  का  डर  न हो

शोहरत से  बेनियाज़  है  फ़नकार  यूं ' वसीम '
ख़ुशबू  की जैसे  फूल को अपनी  ख़बर न हो

साभार: वसीम बरेलवी की फेसबुक वाल से 

1 week ago

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