सुना है क्या: 'खेल प्रतिशत का' की कहानी, साथ ही 'बधाई तक नहीं कबूल और काम न आईं मिन्नतें' के किस्से
यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'खेल प्रतिशत का' की कहानी। इसके अलावा 'बधाई तक नहीं कबूल' और 'काम न आईं मिन्नतें' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...
खेल प्रतिशत का
एक नौकरशाह से जवाब-तलब किया गया है। स्पष्टीकरण पत्र में चार आरोप लगाए हैं। इसका सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि हर आरोप को 10 प्रतिशत राशि की गड़बड़ (कमीशन) से जोड़कर देखा जा रहा है यानी कुल 40 प्रतिशत का कमीशन। फिलहाल स्पष्टीकरण मांगा गया है। देखते हैं मामला कितने प्रतिशत में सुलटता है? पता चलेगा तो एक बार फिर यहीं साझा करेंगे।
बधाई तक नहीं कबूल
माफिया से नेता बने एक पूर्व माननीय के अच्छे दिन तलाशने की आस आजकल बुरे दिनों में तब्दील होती जा रही है। उनके संगी साथियों ने ऐसा धोखा दिया कि कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। बेचारे भविष्य सुधारने के लिए एक बड़े राजनेता को जन्मदिन पर बधाई देकर नंबर बढ़वाना चाहते थे लेकिन मुंह की खानी पड़ी। उनकी बधाई का जवाब नहीं देकर हैसियत दिखा दी गई। सुना है कि सियासी गलियारों में इसकी खूब चर्चा है।
काम न आईं मिन्नतें
पीपीएस अधिकारियों की तबादला सूची में लगभग उनके ही नाम थे, जिनका समय जिलों में पूरा हो चुका है। राजधानी के एक अधिकारी अपने उच्चाधिकारी के पास जाकर तबादला निरस्त कराने की मिन्नतें करने लगे। जब लगा ये संभव नहीं है तो संबद्धता का जुगाड़ लगाने की कोशिश भी की। उच्चाधिकारी ने पूरी बात सुनने के बाद दो टूक कहा कि जहां तबादला हुआ है, वहां जाकर मन से काम करिए। सीओ साहब के सारे अरमानों पर पानी फिर गया। राजधानी में लंबा समय गुजारने का उनका सपना पूरा नहीं हो सका।