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Indore: कमर्शियल सिलिंडर के संकट के बीच इंदौर में फूड स्ट्रीट 56 दुकान पर इंडक्शन में पक रहे पोहे

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर Published by: Abhishek Chendke Updated Thu, 12 Mar 2026 08:31 AM IST
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सार

स्वाद के शौकीनों के शहर इंदौर में इन दिनों जायके पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। शहर के मशहूर होटल, रेस्तरां और चाय की दुकानों को मुश्किल में डाल दिया है।  छप्पन दुकान जैसे व्यस्त इलाकों में अब चूल्हों की जगह बिजली से चलने वाले इंडक्शन ने ले ली है।

Indore: Amid the commercial cylinder crisis, poha is being cooked in induction cooker at Food Street 56 in Ind
56 दुकान में इंडक्शन पर पक रही साबूदाने की खिचड़ी। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

स्वाद के शौकीनों के शहर इंदौर में इन दिनों मसालों की खुशबू पर संकट गहरा गया है। शहर के तमाम रेस्तरां में इन दिनों गैस की किल्लत की हलचल है। इस कमी ने शहर के होटल और रेस्तरां मालिकों के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है, लेकिन इंदौर अपनी जुगाड़ और हर मुश्किल का हल ढूंढने की कला के लिए मशहूर है।

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बुधवार की सुबह जब कई दुकानदारों के पास गैस खत्म होने लगी और नई सप्लाई का कोई ठिकाना नहीं दिखा, तो शहर के जायके पर संकट के बादल मंडराने लगे। कई बड़े रेस्तरां के मेन्यू कार्ड से वो व्यंजन अचानक गायब हो गईं जिन्हें बनाने में ज्यादा वक्त और आंच लगती है। दुकानदार यहां-वहां से सिलिंडर का बंदोबस्त करने में जुटे रहे, लेकिन जब बात नहीं बनी तो उन्होंने तकनीक का दामन थाम लिया। देखते ही देखते छप्पन दुकान की कई दुकानों के काउंटर पर चमचमाते इंडक्शन चूल्हे नजर आने लगे।

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अब जो पोहा और साबूदाना खिचड़ी कल तक गैस की आंच पर तैयार होती थी, वह बिजली की ताकत से पक रही है। मसाला डोसा बनाने के लिए भी इंडक्शन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ गया है। जिन दुकानदारों के पास दो-चार सिलिंडर का स्टॉक बचा भी है, वे उसे किसी किफायत से चला रहे हैं। वे केवल उन्हीं चीजों के लिए गैस जला रहे हैं जिनके बिना काम चल ही नहीं सकता।

व्यापारी संघ के गलियारों में भी इसी बात की चर्चा है कि आखिर ये संकट कब तक चलेगा। बताया जा रहा है कि वैश्विक हालात और युद्ध के चलते एलपीजी की सप्लाई में यह रुकावट आई है। ऐसे में दुकानदारों ने हाथ पर हाथ धरकर बैठने के बजाय विकल्प तलाशना शुरू किया। पहले डीजल की भट्टी पर विचार हुआ, लेकिन इंदौरियों को अपने खाने के स्वाद से कोई समझौता मंजूर नहीं है। डीजल की महक अगर खाने में आ जाए तो जायका बिगड़ जाता है और जेब पर भी यह महंगा पड़ता है। ऐसे में इंडक्शन सबसे साफ-सुथरा और आसान रास्ता बनकर उभरा है।

56 दुकान व्यापारी एसोसिएशन के अध्यक्ष गुंजन जोशी ने बताया कि काम तो रोकना मुमकिन नहीं है, क्योंकि यहां के लोग खाने के बिना रह नहीं सकते। इसलिए जब तक सिलिंडर की किल्लत दूर नहीं होती, तब तक बिजली के उपकरणों से ही शहर की भूख मिटाई जाएगी। यह देखना दिलचस्प है कि कैसे एक संकट ने पारंपरिक रसोई के तरीकों को रातों-रात आधुनिक बना दिया। अब तो आलम यह है कि जो दुकानदार कल तक केवल आग पर भरोसा करते थे, वे भी बिजली के चूल्हों की सेटिंग्स समझने में लगे हैं। संकट बड़ा जरूर है, लेकिन इंदौर का स्वाद फिलहाल थमने वाला नहीं है।

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