हरिद्वार महाकुंभ 2021: बेहद खास है इस बार का कुंभ मेला, एक साथ पड़ रहे 14 महापर्व

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 13 Apr 2021 05:19 PM IST
कुंभ में हरकी पैड़ी पर गंगा पूजन
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मायापुरी हरिद्वार में प्रत्येक कुंभ मेला कुछ न कुछ खास लेकर आता है। इस बार का कुंभ तो और भी खास हो गया है। 12 अप्रैल को हुए शाही स्नान से 14 पर्वों का ऐसा क्रम शुरू हो गया है जो लगातार चलेगा। ये 14 पर्व 10 दिनों में संपन्न हो जाएंगे।

कुंभ तो अपने आप में ही महापर्व है। यही कारण है कि कुंभ के प्रति बड़ा और सम्मान भाव दिखाते हुए कुंभ को महाकुंभ भी कहा जाने लगा है। यद्यपि कुंभ घट ही बड़ा शब्द है, महाकुंभ या महाघट कोई शब्द नहीं है। कुंभ महापर्व के मुख्य स्नान का शुभारंभ सोमवार को सोमवती अमावस्या से हो गया।

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मंगलवार को नव संवत्सर, सोमवती पर्व, बैशाखी और पहला शैलपुत्री नवरात्र एक साथ पड़ जाएंगे। 14 अप्रैल सूर्य के मेष राशि में आते ही कुंभ का मुख्य स्नान होगा। नौ दिनों के नवरात्र चलते रहेंगे।

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इन नौ दिनों में शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री स्वरूपों की पूजा होगी। सिद्धिदात्री के दिन ही  रामनवमी मनाई जाएगी।
हरिद्वार में शाही स्नान
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कुंभ के अवसर पर बैरागी द्वीप पर डेरे लगाकर बैठे हजारों रामानंदियों के पंडालों में राम जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाएगा। कुंभ के दूसरे शाही स्नान से रामनवमी तक होने वाले इन 14 महापर्वों पर कुंभ नगर की शोभा निराली होगी। सनातन धर्म की सभी तेरह शाखाओं का वैभव कुंभनगरी में एकसाथ नजर आएगा।
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हरिद्वार में शाही स्नान
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कुंभ मेले और कुंभ घट को साधारण पर्व या मात्र शाही स्नान पर्व न मानें। इस कुंभ में अनादि त्रिदेवों, सप्त समुद्रों और चारों वेदों का निवास है। कुंभ महापर्व के प्रतीक कुंभ घट में पृथ्वी और आकाश भी समाए हुए हैं। कुंभ कलश का घट स्वरूप पवित्रता और अनंत मांगल्य का प्रतीक है।
महाकुंभ में शाही स्नान करते बैरागी अखाड़ों के संत
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ऋग्वेद में कुंभ की महिमा लिखी है। वेद के अनुसार कुंभ के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा, मध्य भाग में मातृकागण, कुक्षी में सप्त समुद्र और सप्तद्वीप एवं पृथ्वी आकाश समाए हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अपने समस्त अवयवों के साथ कुंभ में निवास करते हैं।
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हरिद्वार में शाही स्नान
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शास्त्रों में कुंभ को चावल, खांड, चांदी सोने से भरकर दान देने की परंपरा रही है। कुंभ स्नान के बाद जलकलश दान में दिया जाता है। श्रद्धालु पीतल या तांबे के लोटे पर श्रीफल नारियल रखकर अमृत कुंभ का ध्यान कर कुंभ दान करते हैं।
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