सब्सक्राइब करें

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त

बाइस्कोप: सुधीर मिश्रा की इस फिल्म से मिली सत्या को असली सांसें, इम्तियाज के संवादों ने जमा दिया रंग

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sun, 07 Jun 2020 08:27 PM IST
विज्ञापन
is raat ki subah nahin this day that year series by pankaj shukla 7 june 1996 bioscope sudhir Mishra
इस रात की सुबह नहीं - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला

राम गोपाल वर्मा की फिल्म सत्या में जब भीखू म्हात्रे चिल्लाकर पूछता है, मुंबई का किंग कौन? तो समझ आता कि हिंदी सिनेमा में फिल्मों की यहां से एक अलग श्रेणी बननी शुरू हुई है। ये सिनेमा ऐसे किरदारों की कहानियां लेकर आता है, जिनमें हर एक अपनी अपनी खुशी में मस्त है। सब एक गंदे नाले के से बहाव में बहते जा रहे हैं जिसकी नियति है समंदर में जाकर गिर जाना। कोई इससे बाहर निकलने की कोशिश करता नहीं दिखता। कोई अपने किरदार पर जमी दोगलेपन की परत को भी साफ करता नहीं दिखता। लोग भले इस फिल्म परंपरा का हिंदी में चलन सत्या से मानते हों, मैं इन फिल्मों की श्रेणी की शुरूआत मानता हूं विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म परिंदा और सुधीर मिश्रा की फिल्म इस रात की सुबह नहीं से। परिंदा 1989 में रिलीज हुई और इस रात की सुबह नहीं साल 1996 में। दोनों के संवादों ने ही इन फिल्मों का असली रंग रूप बनाया और इनके किरदारों का असली तेवर दिखाया। सत्या से दो साल पहले रिलीज हुई फिल्म इस रात की सुबह नहीं हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।

Trending Videos
is raat ki subah nahin this day that year series by pankaj shukla 7 june 1996 bioscope sudhir Mishra
इस रात की सुबह नहीं - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म इस रात की सुबह नहीं जब बननी शुरू हुई तो इसका नाम सुधीर मिश्रा ने रखा था, निशाचर। वो इसलिए कि इसमें जितने किरदार हैं सब एक रात की कहानी में शामिल है। कोई न ऊंघ रहा है, न अलसा रहा है। सब अपने अपने हालात को लेकर चौकन्ने हैं। करीबी दोस्त रहे निर्मल पांडे के करियर का ये फिल्म टर्निंग प्वाइंट रही। तारा देशपांडे और स्मृति मिश्रा ने भी सबको प्रभावित किया। खासतौर से स्मृति मिश्रा ने जिस तरह एक शादीशुदा शख्स से प्रेम करने का किरदार बहुत ही संतुलित और सधे हुए अंदाज में किया, उसके लिए उनकी अब तक तारीफें होती हैं। और फिल्म में विलेन बने सुधीर विद्यार्थी का किरदार ऐसा है कि फिल्म देखते समय आपको हीरो से नफरत और विलेन से प्यार हो जाएगा। कहानी यूं है कि विज्ञापन कंपनी में काम करने वाला आदित्य घर पहुंचने के बाद बिस्तर पर ढेर होता है और थोड़ी देर में शुरू होने वाली ऑफिस पार्टी के लिए अपनी माशूक मालविका को फोन करता है। इतने में बाथरूम से उसकी बीवी पूजा निकलकर आ जाती है। उसे आना तो हफ्ते भर बाद था लेकिन वह जल्दी आ गई है। पार्टी में वह भी आती है। पूजा को आदित्य और मालविका के प्रेम के बारे में पता चल जाता है और वह अपने पति को भरी महफिल में चांटा रसीदकर घर चली आती है।

उसी होटल में डॉन रमन भाई अपनी टोली के विलास को सबक सिखाने आया हुआ है। दोनों को अपने बीच की गलतफहमी समझ में आने ही वाली होती है कि गोलीबारी में विलास की पत्नी मारी जाती है। उधर, पूजा अपने आदित्य को घर से निकाल देती है तो वह एक बार में बैठकर बार बार उसे फोन कर रहा है। रमनभाई के गुर्गे उसी बार से सरकारी अस्पताल के डॉक्टर को फोन कर रहे हैं ताकि विलास की बीवी की मौत को हार्ट अटैक से हुई मौत बताकर सर्टिफिकेट बनवा सकें। फोन एक ही है और उससे कॉल करने को लेकर हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि आदित्य का गुस्से में उठा हाथ रमनभाई के गाल पर पड़ता है। अब एक पूरी रात में दर्शकों को मुंबई का हर चेहरा नजर आ जाता है। कामयाब शादीशुदा आदमी का बीवी के अलावा किसी और से प्रेम, प्रेमिका का अपने प्रेमी के जीवन में अपने अस्तित्व की पहचान, पत्नी का पति से दिल टूटने के बाद किसी दोस्त के संग टाइम पास और जब सारे अच्छे लोगों के बुरे चेहरे एक के बाद एक सामने आते रहते हैं तो सामने ये भी आता है कि रमनभाई जैसा डॉन जिसे जमाना बुरा समझता है, वह इतना बुरा भी नहीं है।

विज्ञापन
विज्ञापन
is raat ki subah nahin this day that year series by pankaj shukla 7 june 1996 bioscope sudhir Mishra
इस रात की सुबह नहीं - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

सुधीर इस फिल्म को अपने छोटे भाई के साथ हुई सच्ची घटना बताते हैं। फिल्म के क्रेडिट्स में स्टोरी का क्रेडिट भी सुधांशु मिश्रा को ही दिया गया है। वह सुधांशु मिश्रा जिनके पूना फिल्म इंस्टीट्यूट में होने के दौरान सुधीर का ज्यादातर वक्त उनके साथ ही बीतता था। सुधीर ने सुधांशु से ही सिनेमा सीखा। वहीं पढ़ाई के दौरान एक रात सुधांशु ने सरे राह छेड़खानी करते एक युवक को चांटा मार दिया था। बाद में पता चला कि वह तो लोकल डॉन का भाई है। फिर इसके बाद कई दिन सुधांशु के हॉस्टल में छिपते बीते। सुधांशु का निधन बहुत कम उम्र में हो गया। फिल्म इस रात की सुबह नहीं की एडीटर रेनू सलूजा जब अपने पति विधु विनोद चोपड़ा से अलग हुईं तो वह सुधीर की ही हमराही बनीं। तीनों एक साथ कुंदन शाह की फिल्म जाने भी दो यारों के दिनों से काम करते आए थे।

आम जिंदगी में हम अक्सर फकीरों के बारे में सुनते हैं कि उन्हें किसी की कुछ नहीं तो छोड़िए अपनी भी कुछ खास पड़ी नहीं होती। सुधीर मिश्रा को मैं सिनेमा का फकीर मानता हूं। इस रात की सुबह नहीं, वह फिल्म है जिसका पूरा अंडरकरंट रामगोपाल वर्मा की सत्या में आपको दिख सकता है। लेकिन, सुधीर ने कभी इस बारे में किसी से जिक्र तक नहीं किया। सत्या लिखने वाले अनुराग कश्यप और सौरभ शुक्ला दोनों उनके दोस्त। कल्लू मामा का किरदार पूरा का पूरा इस रात की सुबह नहीं के विलास का विस्तार ही तो है। सुधीर फक्कड़ तबीयत के इंसान हैं। इस रात की सुबह नहीं पर लिखने से पहले मैंने आज भी उन्हें फोन किया। ये फिल्म उनकी दुखती रग भी है। इसलिए जानकार लोग ज्यादा उनसे इस पर बात नहीं करते हैं। फिल्म शुरू होने से पहले उन्होंने अपना भाई और फिल्म खत्म होने के बाद उन्होंने अपनी सबसे करीबी दोस्त और इस फिल्म की एडीटर रेनू सलूजा खो दी। फिल्म का ये गाना उनके एहसासों की एक बानगी ही तो है..


 

is raat ki subah nahin this day that year series by pankaj shukla 7 june 1996 bioscope sudhir Mishra
इस रात की सुबह नहीं - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

‘जीवन क्या है कोई ना जाने, जो जाने पछताए...’ हिंदी फिल्मों के लिए निदा फाजली ने जो कुछ लिखा है, उसमें इस गीत का सबसे अलग स्थान है। फिल्म इस रात की सुबह नहीं के संवाद लेखक इम्तियाज हुसैन बताते हैं, “जब हम लोग निदा साब के यहां फिल्म की कहानी बताने और इसके गानों पर चर्चा करने के लिए गए तो मैंने उनसे एक ही रिक्वेस्ट की। और वह ये कि वह फिल्म के लिए कुछ कुछ वैसा एक गाना लिख दें जैसा फिल्म गाइड के लिए शैलेन्द्र ने लिखा था, ‘वहां कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहां।’ और निदा साब ने इस गाने में वाकई कमाल कर दिया।” इस गाने को दक्षिण के मशहूर संगीतकार एम एम क्रीम ने खुद गाया है। नई पीढ़ी भले उन्हें बाहुबली सीरीज की दोनों फिल्मों के संगीत के लिए जानती हो लेकिन हिंदी सिनेमा से उनका रिश्ता महेश भट्ट ने साल 1995 में नागार्जुन की फिल्म क्रिमिनल से जोड़ा था, जिसका एक गाना, तुम मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिए, बहुत हिट हुआ था। एम एम क्रीम को इस रात की सुबह नहीं में भी महेश भट्ट ही लेकर आए क्योंकि ये फिल्म प्लस चैनल के लिए उन्हीं की देखरेख में बनी। फिल्म का एक और गाना, जो मेरा भी फेवरिट गाना है, उन दिनों का सुपरहिट गाना रहा, उसमें आपको मशहूर अभिनेता आर माधवन की झलक भी दिख जाएगी। ये माधवन की बड़े परदे पर पहली झलक मानी जाती है....



फिल्म इस रात की सुबह नहीं के नामकरण का किस्सा भी काफी रोचक है। फिल्म के संवाद लेखक इम्तियाज हुसैन बताते हैं, “हम लोग फिल्म का काम खत्म कर चुके थे। पहली कॉपी बन चुकी थी। हम लोग उसे देख भी चुके थे। फिल्म के टाइटल वगैरह सब बनकर रेडी थे। एक दिन हम लोग ऐसे ही प्लस चैनल के दफ्तर से निकल कर बाहर खड़े थे तो आशुतोष गोवारिकर सामने की बिल्डिंग से बाहर आए। बातचीत चली तो उन्होंने बताया कि वो कोई गाना रिकॉर्ड करके आए हैं, जिसका लब्बोलुआब है, इस रात की सुबह नहीं। सुधीर को फट से ये नाम अटक गया। तुरंत उन्होंने अपनी फिल्म का नाम निशाचर से बदलकर कर दिया, इस रात की सुबह नहीं।” फिल्म के कार्यकारी निर्माता महेश भट्ट को भी ये नया नाम पसंद आया लेकिन ये बात आज तक राज ही है कि उन्होंने इस फिल्म की रिलीज में अपनी उन्हीं दिनों बन रही दूसरी फिल्म पापा कहते हैं जैसा उत्साह क्यों नहीं दिखाया। फिल्म इस रात की सुबह नहीं का हाल ये था कि ये सिनेमाघरों में नियमित शो में लगी ही नही। मुंबई में ये सिर्फ मिनर्वा में लगी सुबह के शो में। सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के दौर में नियमित 12 बजे से शुरू होने वाले शोज से पहले एक मॉर्निग शो भी सुबह 10 बजे के करीब हुआ करता था। मैंने ये भी फिल्म मुरादाबाद में मॉर्निंग शो में ही देखी थी।

विज्ञापन
is raat ki subah nahin this day that year series by pankaj shukla 7 june 1996 bioscope sudhir Mishra
इस रात की सुबह नहीं - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

सुधीर मिश्रा के साथ इस फिल्म की शूटिंग के दौरान युवा और उत्साही लोगों की पूरी टोली हुआ करती थी। राइटर अतुल तिवारी आपको फिल्म में पटेल के घर चल रही पार्टी में मस्ती करते नजर आएंगे। अब अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस खोल चुके निखिल आडवाणी इस फिल्म के चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर थे। फिल्म की पटकथा में भी उन्होंने हाथ बंटाया। रूचि नारायण भी आपको पार्टी वाले इस सीन में दिखेंगी। वह फिल्म में सुधीर की फर्स्ट असिस्टेंट डायरेक्टर थीं। जी हां, वही रूचि नारायण जिनकी नेटफ्लिक्स फिल्म गिल्टी और हॉटस्टार वेब सीरीज हंड्रेड की इस साल खूब चर्चा हुई है।

सुधीर मिश्रा ने भले कहीं से निर्देशन सीखा न हो लेकिन इससे पहले अपनी पहली फिल्म ये वो मंजिल तो नहीं में नेशनल अवार्ड जीत चुके सुधीर की फिल्म इस रात की सुबह नहीं एक ऐसी फिल्म है जिसे अगर अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में कायदे से प्रचारित किया गया होता तो वह दुनिया के शीर्षस्थ निर्देशकों की पहली पंगत में कब का बैठ चुके होते। सुधीर को मैं क्वैंटिन टैरेंटिनो के स्तर का फिल्म निर्देशक मानता हूं। दोनों एक ही समय में सिनेमा में आए। बल्कि सुधीर फिल्मोग्राफी के मामले में उनके सीनियर ही हैं। सुधीर के करियर को हमेशा हर कदम एक नई चुनौती में डालने के लिए अगर कुछ जिम्मेदार है तो वह है फिल्म इस रात की सुबह नहीं को ढंग से रिलीज न किया जाना। सुधीर एक ताकतवर राजनीतिक परिवार के सदस्य रहे हैं, लेकिन उनकी फकीरी ने कभी मुंबई में उनका ये रुतबा जाहिर नहीं होने दिया। और, न ही कभी उन्होंने इसे जताया ही। मैं तो तीन नेशनल फिल्म अवार्ड जीत चुके सुधीर की उस फकीरी का कायल हूं जिसमें वह काउंटर पर आपको खड़ा देख सीधे बोल सकते हैं कि एक कॉफी मेरे लिए भी। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल यानी 8 जून को बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।

पढ़ें: बाइस्कोप: अमिताभ बच्चन के हाथों बेइज्जती के बाद इस डायरेक्टर ने 10 साल तक नहीं बनाई कोई हिंदी फिल्म

अगली फोटो गैलरी देखें
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें Entertainment News से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। मनोरंजन जगत की अन्य खबरें जैसे Bollywood News, लाइव टीवी न्यूज़, लेटेस्ट Hollywood News और Movie Reviews आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed