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Indore Mayor Election: इंदौर महापौर चुनाव पर क्या कहती है ग्राउंड रिपोर्ट, जानें पांच पॉइंट्स में

दिनेश शर्मा
Updated Sun, 26 Jun 2022 06:42 PM IST
इंदौर महापौर के लिए भाजपा से पुष्यमित्र भार्गव तो कांग्रेस से संजय शुक्ला मैदान में हैं।
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इंदौर की गलियों-गलियों में उत्सवी माहौल है। गाड़ियों-रिक्शाओं पर लाउडस्पीकर लगाकर प्रचार संबंधी गाने बज रहे हैं। महापौर हो या पार्षद, मुख्य मुकाबला भाजपा-कांग्रेस में ही है। कुछेक वार्डों में निर्दलीयों का पलड़ा भारी लग रहा है। हालांकि लगभग 10 दिन बाद मतदान है। मतदान के दो दिन पहले प्रचार बंद हो जाएगा। इन आठ दिनों में बहुत सा पानी सिर के ऊपर से निकल जाना है। 

महापौर चुनाव में भाजपा से पुष्यमित्र भार्गव और कांग्रेस से संजय शुक्ला के बीच मुख्य मुकाबला है। वैसे तो 19 प्रत्याशी महापौर बनने के लिए किस्मत आजमा रहे हैं। सभी प्रचार में जान झोंक रहे हैं। शहर की नजरें भाजपा-कांग्रेस प्रत्याशी के बीच ही है। आइए पांच पाइंट्स में जानते हैं दोनों प्रत्याशियों का शहर में क्या माहौल है। 
 
इंदौर महापौर के दोनों प्रत्याशियों ने एमपी को रणजी ट्रॉफी जीतने पर बधाई दी है।
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1. चुनावी वादे
सबसे पहले बात करते हैं चुनावी वादों की। कांग्रेस के प्रत्याशी संजय शुक्ला ने कई वादे ऐसे किए हैं जो ध्यान खींच रहे हैं। उन्होंने जीतने पर शहर की गरीब परिवारों को 200 लीटर पानी मुफ्त देने, कारोबारियों को निगम के ट्रेड लायसेंस से मुक्त करने, निगम के अस्थायी कर्मियों को स्थायी करने, पीली गैंग का आतंक मिटाने तक की बात कर चुके हैं, वहीं पुष्यमित्र भार्गव की ओर से ऐसा कोई वादा जनता के बीच नहीं पहुंच सका है, जिस पर चर्चा की जा सके। भार्गव की ओर से केंद्र सरकार, राज्य सरकार और भाजपा के पूर्व महापौर के विकास और योजनाओं की ही बातें की जा रही हैं। जैसे स्मार्ट सिटी मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना में इंदौर के हितग्राहियों का आवंटन, दीनदयाल अंत्योदय रसोई योजना। विकास किया है विकास करेंगे के नारे के साथ भार्गव मैदान में हैं। 

2. चुनावी मुद्दे
चुनावों में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने का सिलसिला तो हर चुनाव में देखने को मिलता है। चुनावी मुद्दों पर बात की जाती है। शहर में 20 सालों से भाजपा का महापौर है तो कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी नहीं है। संजय शुक्ला शहर में पानी, भ्रष्टाचार, निगम कर्मियों की कथित दादागीरी जैसे मुद्दों को उठा रहे हैं। भाजपा के कार्यकाल की खामियों के साथ नगर निगम में दो साल के अफसर राज पर भी उंगली उठा रहे हैं। वहीं कैलाश विजयवर्गीय के बयान, जिसमें उन्होंने संजय शुक्ला को बच्चा बताया था, को भी संजय खूब भुना रहे हैं। लगभग हर जगह वे बच्चा शब्द का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। चाहे खुद को शहर का बच्चा बताना हो, रमेश मेंदोला के घर जाकर कहना कि दादा मैं तो आपका बच्चा हूं। वहीं भार्गव के पास बताने को कोई खास मुद्दे नहीं हैं। वे शहर के ट्रैफिक को नंबर वन बनाने की बात कर रहे हैं। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की बात कर रहे हैं।  कुल मिलाकर भार्गव के पास ऐसे मुद्दे नहीं हैं जिनसे वे कांग्रेस पर हमलावर हो सकें। 
 
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भाजपा के भार्गव विकास के नाम पर तो संजय वादों के आधार पर वोट मांग रहे हैं।
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3. चुनावी प्रचार या जनसंपर्क
चुनावी प्रचार के मामले में दोनों प्रत्याशी बराबरी पर नजर आ रहे हैं। हालांकि संजय शुक्ला पहले से जानते थे कि उन्हें महापौर का चुनाव लड़ना है तो उन्होंने जनसंपर्क पहले से शुरू कर दिया था। आधे से ज्यादा शहर में वे घना जनसंपर्क कर चुके हैं। वहीं भार्गव का जनसंपर्क 17 जून से शुरू हुआ है। भार्गव कम समय में ज्यादा से ज्यादा इलाकों को कवर करने के चक्कर में घना जनसंपर्क नहीं कर पा रहे हैं। संजय शुक्ला के कोरोना काल में किए कामों को प्रचारित किया जा रहा है। उनकी अयोध्या तीर्थ यात्रा का बखान किया जा रहा है। वहीं भाजपा शहर विकास की बात पर जनता के सामने है। भार्गव खुद कह चुके हैं कि कमल का फूल चुनाव लड़ता है यानी उन्हें शहर में भाजपा के कार्यकर्ता और पार्टी के भरोसे मैदान में डटे हैं। हालांकि वार्डों में लगातार घूम रही गाड़ियां और उन पर लगे लाउडस्पीकर पार्षदों के साथ दोनों प्रत्याशियों का जमकर प्रचार कर रहे हैं। 
संजय शुक्ला के नामांकन में कमलनाथ पहुंचे थे
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4. बैक सपोर्ट या कहें पर्दे के पीछे की राजनीति
दोनों प्रत्याशियों का प्रचार तो चल ही रहा है पर दोनों ही दलों की ओर से पर्दे के पीछे भी जोर लगाया जा रहा है। पुष्यमित्र भार्गव के लिए जहां संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं का तगड़ा नेटवर्क काम कर रहा है, वहीं संजय शुक्ला पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ अपनी टीम के सहारे मैदान में हैं। संजय शुक्ला की टीम वार्डों में जाकर कमान संभाले हैं। वे काम किया है काम करेंगे की बात कहकर जनता के बीच जा रहे हैं। भार्गव की टीम में उतने मंझे लोगों की कमी है। वे अपने स्तर पर राजनीति की बिसात बिछा रहे हैं। कहीं-कहीं पार्टी के कार्यकर्ता ही ठंडे नजर आ रहे हैं। संजय शुक्ला के नामांकन में कमलनाथ पहुंचे थे तो भार्गव के लिए शिवराज सिंह चौहान शहर आ चुके हैं। इसके अलावा दोनों ही प्रत्याशियों के लिए बड़े नेताओं का इन्वॉल्वमेंट नजर नहीं आ रहा है। वहीं सोशल मीडिया पर प्रचार जमकर हो रहा है। संजय शुक्ला के वादे, उनके हमलावर मुद्दे, कोरोना के समय के काम आदि को लगातार प्रसारित किया जा रहा है, वहीं भार्गव की ओर से सरकारों की योजनाओं का जिक्र दिख रहा है। 
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भार्गव के लिए शिवराज सिंह चौहान शहर आ चुके हैं।
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5. युवाओं पर फोकस
इंदौर शहर में इस बार 18 लाख 35 हजार 316 वोटर नगर सरकार चुनेंगे। इसमें करीब पौने चार लाख ऐसे वोटर हैं जो पहली बार मतदान करेंगे। दोनों पार्टियों के अपने परंपरागत वोट हैं ही, तो दोनों ही दलों का फोकस युवा वोटर्स पर है। भाजपा ने उच्च शिक्षित प्रत्याशी को उतारकर उसी वर्ग को खींचने की कोशिश की है। शहर के ग्राउंड पर अभी जो हालात हैं उसमें मुकाबला बराबरी से कहीं कम तो कहीं ज्यादा नजर आ रहा है। 6 जुलाई को मतदान है, उसी से तय होगा कि कौन सीएम के सपनों के शहर का महापौर होगा। 
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