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महमूद और जमीला
मंटो के अफसाने

सुनिए मंटो का अफसाना : आर्टिस्ट लोग

23 September 2022

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इस कहानी में कलाकारों के दर्द को बयान किया गया है। महमूद और जमीला अपनी कला को एक मुकाम देने के लिए जतन करते हैं लेकिन हालात से परेशान हो कर आर्थिक निश्चिंतता के लिए वे एक फैक्ट्री में काम करने लगते हैं, लेकिन दोनों को यह काम कलाकार के प्रतिष्ठा के अनुकूल महसूस नहीं होता इसीलिए दोनों एक दूसरे से अपनी इस मजबूरी और काम को छुपाते हैं।

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सभी 26 एपिसोड

नगर-नगर ढिंडोरा पीटा गया कि जो आदमी भीख मांगेगा उसको गिरफ़्तार कर लिया जाएं गिरफ्तारियां शुरू हुईं. लोग ख़ुशियां मनाने लगे कि एक बहुत पुरानी लानत दूर हो गई...

सुरेंद्र ने उन अधेड़ उम्र की नौकरानियों से अपनी तरफ़ से कोई कोशिश नहीं की थी। वो ख़ुद उसको खींच कर अपनी कोठरियों में ले जाती थीं। मगर सुरेंद्र अब महसूस करता था कि ये सिलसिला उस को अब ख़ुद करना पड़ेगा, हालाँकि उसकी तकनीक से क़तअ’न नावाक़िफ़ था...
 

जावेद पेशावर से ही ट्रेन के ज़नाना डिब्बे में एक औरत को देखता चला आ रहा था और उस पर फ़िदा हो रहा था. लाहौर पहुंच कर जब उसे मालूम हुआ कि वह एक वेश्या है तो वह उलटे पांव रावलपिंडी वापस हो गया...

आयशा ने शफ़क़त का हाथ दबाया. पलट कर उसने अपनी बीवी की तरफ़ सवालिया नज़रों से देखा. उसने आंखों ही आंखों में कोई इशारा किया जिसे शफ़क़त न समझ सका. वो मुतहय्यर था कि ख़ुदा मालूम क्या बात थी कि उसकी बीवी ने उसका हाथ दबाया और इशारा भी किया...

कुछ दिनों से मोमिन बहुत बेक़रार था। उसको ऐसा महसूस होता था कि उसका वजूद कच्चा फोड़ा सा बन गया था। काम करते वक़्त, बातें करते हुए हत्ता कि सोचने पर भी उसे एक अजीब क़िस्म का दर्द महसूस होता था। ऐसा दर्द जिसको वो बयान भी करना चाहता तो न कर सकता...

ऐसे इंसान बहुत कम हैं, जिन्होंने हालात की परवाह न करते हुए ज़िंदगी की बागडोर अपने हाथ में संभाल ली. टॉमस विल्सन भी इसी क़बील से था. उसने अपनी ज़िंदगी बदलने के लिए अनोखा क़दम उठाया, पर उसकी मंज़िल का चूंकि कोई पता नहीं था, इसलिए उसकी कामयाबी के बारे में अंदाज़ा लगाना मुश्किल था...

बरसात

27 September 202215 mins 41 secs

मंटो का अफसाना : बू

बरसात के यही दिन थे। खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह नहा रहे थे। सागवान के इस स्प्रिंगदार पलंग पर जो अब खिड़की के पास से थोड़ा इधर सरका दिया गया था एक घाटन लौंडिया रणधीर के साथ चिपटी हुई थी...

ईशर सिंह जूही होटल के कमरे में दाख़िल हुआ, कुलवंत कौर पलंग पर से उठी। अपनी तेज़ तेज़ आंखों से उसकी तरफ़ घूर के देखा और दरवाज़े की चटखनी बंद कर दी। रात के बारह बज चुके थे, शहर का मुज़ाफ़ात एक अजीब पुर-असरार ख़ामोशी में ग़र्क़ था...

मान लिया कि मेरा किसी को उल्लू का पट्ठा कहने को जी चाहता है, मगर ये कोई बात तो न हुई. मैं किसी को उल्लू का पट्ठा क्यों कहूं? मैं किसी से नाराज़ भी तो नहीं हूं...
 

मैं जब उस की तरफ़ बढ़ा तो उस ने पलट कर मेरी तरफ़ देखा. बारिश के लरज़ते हुए पर्दे में से मुझे देख कर भागी. मगर मैंने चंद गज़ों ही में उसे जा पकड़ा. जब हाथ इस के चिकने ज़ीन कोट पर पड़ा तो वो अंग्रेज़ी में चिल्लाई...हेल्प...हेल्प... 

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