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Politics: मालवा की लहर तय करती है पंजाब की सत्ता, इस बेल्ट पर सभी दलों की नजर; हर चुनाव में बदला सियासी समीकरण
मोहित धुपड़, अमर उजाला, मोगा
Published by: Sharukh Khan
Updated Tue, 09 Jun 2026 03:00 PM IST
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सार
पंजाब की सत्ता मालवा की लहर तय करती है। 69 सीटों वाली बेल्ट पर सभी दलों की नजर है। 117 में से 69 विधानसभा सीटें इसी क्षेत्र में हैं। हर चुनाव में सियासी समीकरण बदलता रहा है। आप, कांग्रेस, अकाली दल और भाजपा ने सक्रियता बढ़ा दी है। किसान और पंथक मुद्दे निर्णायक रहते हैं।
punjab politics
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
पंजाब की राजनीति में मालवा क्षेत्र सबसे अहम माना जाता है। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं कि राज्य की 117 विधानसभा सीटों में से 69 सीटें इसी क्षेत्र में आती हैं बल्कि यह भी है कि यहां से उठी सियासी लहर अक्सर पूरे पंजाब की राजनीति का रुख तय करती है।
राजनीतिक आंदोलनों से लेकर किसान आंदोलनों तक मालवा ने हमेशा अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। प्रदेश के कई बड़े नेता और प्रमुख किसान जत्थेबंदियां भी इसी क्षेत्र से जुड़ी रही हैं। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए सभी राजनीतिक दलों ने मालवा पर अपना फोकस बढ़ा दिया है।
राजनीतिक दल इस क्षेत्र के महत्व को अच्छी तरह समझते हैं। हालांकि मालवा के मतदाताओं का मिजाज समझना आसान नहीं रहा। यहां के लोगों ने समय-समय पर लगभग सभी प्रमुख दलों को मौका दिया है और सत्ता परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभाई है।
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राजनीतिक आंदोलनों से लेकर किसान आंदोलनों तक मालवा ने हमेशा अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। प्रदेश के कई बड़े नेता और प्रमुख किसान जत्थेबंदियां भी इसी क्षेत्र से जुड़ी रही हैं। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए सभी राजनीतिक दलों ने मालवा पर अपना फोकस बढ़ा दिया है।
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राजनीतिक दल इस क्षेत्र के महत्व को अच्छी तरह समझते हैं। हालांकि मालवा के मतदाताओं का मिजाज समझना आसान नहीं रहा। यहां के लोगों ने समय-समय पर लगभग सभी प्रमुख दलों को मौका दिया है और सत्ता परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभाई है।
वर्ष 2012 में बदली तस्वीर
पिछले पांच विधानसभा चुनावों के नतीजे इसकी पुष्टि करते हैं। वर्ष 2002 में मालवा की सबसे अधिक 29 सीटें कांग्रेस ने जीती थीं जबकि शिरोमणि अकाली दल को 27 सीटें मिली थीं। वर्ष 2007 में कांग्रेस ने 37 सीटों पर जीत दर्ज की जबकि अकाली दल को 19 सीटें मिलीं। वर्ष 2012 में तस्वीर बदली और अकाली दल ने 34 सीटों पर कब्जा कर लिया जबकि कांग्रेस 31 सीटों तक सीमित रही।
पिछले पांच विधानसभा चुनावों के नतीजे इसकी पुष्टि करते हैं। वर्ष 2002 में मालवा की सबसे अधिक 29 सीटें कांग्रेस ने जीती थीं जबकि शिरोमणि अकाली दल को 27 सीटें मिली थीं। वर्ष 2007 में कांग्रेस ने 37 सीटों पर जीत दर्ज की जबकि अकाली दल को 19 सीटें मिलीं। वर्ष 2012 में तस्वीर बदली और अकाली दल ने 34 सीटों पर कब्जा कर लिया जबकि कांग्रेस 31 सीटों तक सीमित रही।
वर्ष 2017 में कांग्रेस ने फिर वापसी करते हुए मालवा में 40 सीटें जीतीं। वहीं अकाली दल महज आठ सीटों पर सिमट गया। इसी चुनाव में आम आदमी पार्टी ने पहली बार इस क्षेत्र में मजबूत दस्तक देते हुए 18 सीटें हासिल कीं। वर्ष 2022 में मालवा के मतदाताओं ने आम आदमी पार्टी को अभूतपूर्व समर्थन दिया और पार्टी ने 69 में से 66 सीटों पर जीत दर्ज कर ली। कांग्रेस को दो और अकाली दल को केवल एक सीट मिली।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मालवा के मतदाता मुद्दों और माहौल के आधार पर फैसला करते हैं। यही कारण है कि यहां किसी एक दल का स्थायी वर्चस्व नहीं रहा। बरनाला, बठिंडा, फरीदकोट, फतेहगढ़ साहिब, फाजिल्का (अबोहर तहसील को छोड़कर), फिरोजपुर, लुधियाना, मलेरकोटला, मानसा, मोगा, पटियाला, श्री मुक्तसर साहिब, रूपनगर और संगरूर जिले मालवा क्षेत्र का हिस्सा माने जाते हैं।
नेताओं की छवि और डेरा फैक्टर का असर
बरनाला के राजनीतिक मामलों के जानकार बघेल सिंह धालीवाल के अनुसार मालवा के लोग सरल स्वभाव के हैं लेकिन उनमें बदलाव लाने की क्षमता भी है। नेताओं के भाषण, घोषणाएं और वादे यहां के मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। ग्रामीण संस्कृति का भी राजनीति पर गहरा प्रभाव है। डेरा सिरसा और डेरा ब्यास जैसे धार्मिक केंद्रों का असर भी कई क्षेत्रों में देखा जाता है। क्षेत्र में सभी वर्गों के लोग रहते हैं लेकिन जट्ट सिख बिरादरी की राजनीतिक भूमिका अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली मानी जाती है।
बरनाला के राजनीतिक मामलों के जानकार बघेल सिंह धालीवाल के अनुसार मालवा के लोग सरल स्वभाव के हैं लेकिन उनमें बदलाव लाने की क्षमता भी है। नेताओं के भाषण, घोषणाएं और वादे यहां के मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। ग्रामीण संस्कृति का भी राजनीति पर गहरा प्रभाव है। डेरा सिरसा और डेरा ब्यास जैसे धार्मिक केंद्रों का असर भी कई क्षेत्रों में देखा जाता है। क्षेत्र में सभी वर्गों के लोग रहते हैं लेकिन जट्ट सिख बिरादरी की राजनीतिक भूमिका अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली मानी जाती है।
मोगा के राजनीतिक विश्लेषक मलकीत सिंह का कहना है कि पंथक मुद्दों का मालवा में विशेष प्रभाव रहता है। बरगाड़ी, बहबल कलां और कोटकपूरा से जुड़े बेअदबी मामलों से लेकर धार्मिक और सामाजिक मुद्दों तक यहां उठे विषय पूरे पंजाब की राजनीति को प्रभावित करते हैं।
राजनीतिक विषयों के विशेषज्ञ जगतार सिंह भुल्लर के अनुसार मालवा की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल और भाजपा ने अपने प्रदेशाध्यक्ष इसी क्षेत्र से चुने हैं। विकास के मुद्दों के साथ-साथ लोकलुभावन घोषणाएं भी यहां के मतदाताओं पर असर डालती हैं।
मिशन-2027 में क्यों सबसे अहम है मालवा
विधानसभा चुनाव 2027 को देखते हुए मालवा एक बार फिर राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है। विभिन्न दल क्षेत्र में अपने स्तर पर सर्वे करा रहे हैं। कांग्रेस अपना सर्वे करा चुकी है जबकि अन्य दल भी संगठन और चुनावी रणनीति को मजबूत करने में जुटे हैं।
विधानसभा चुनाव 2027 को देखते हुए मालवा एक बार फिर राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है। विभिन्न दल क्षेत्र में अपने स्तर पर सर्वे करा रहे हैं। कांग्रेस अपना सर्वे करा चुकी है जबकि अन्य दल भी संगठन और चुनावी रणनीति को मजबूत करने में जुटे हैं।
बठिंडा, मानसा, सरदूलगढ़, मोड़ मंडी, रामपुराफूल और तलवंडी साबो जैसे क्षेत्रों में किसान वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है। वर्ष 2022 में यहां आम आदमी पार्टी का दबदबा रहा था लेकिन कांग्रेस और अकाली दल अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में हैं। वहीं भाजपा भी इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए लगातार सक्रियता बढ़ा रही है। यही वजह है कि पंजाब की सियासत में आज भी मालवा सबसे निर्णायक क्षेत्र माना जा रहा है।