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ओपिनियन: क्या AI के नाम पर टेक कंपनियां कर रहीं गुमराह, आखिर शोधकर्ता क्यों कह रहे- उम्मीदों को रीसेट करने का समय आ गया

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रदीप पाण्डेय Updated Fri, 01 Jul 2022 02:09 PM IST
सार

शोधकर्ताओं का कहना है कि टेक कंपनियां अपने एआई की क्षमताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही हैं जिससे बड़े स्तर पर गलतफहमी पैदा हो रही है। एलन इंस्टीट्यूट फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ओरेन एट्जियोनी कहते हैं कि एआई को लेकर हम संतुलन से बाहर हैं।

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artificial intelligence - फोटो : amarujala
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विस्तार

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर लंबे समय से काम चल रहा है। तमाम बड़ी कंपनियां वर्षों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर हर साल अरबों रुपये खर्च कर रही हैं। एआई को लेकर लंबे समय से बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। एआई को लेकर यहां तक दावे किए गए कि यह इंसानों से अधिक समझदार है और बिना गलती अपने काम को पूरा करने में सक्षम है लेकिन अब शोधकर्ताओं का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर उम्मीदों को अब रीसेट करने का समय आ गया है। आखिर शोधकर्ता ऐसा क्यों कह रहे हैं?

टेक कंपनियों के दावे से गलतफहमी!

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर सभी टेक कंपनियों के अपने अलग-अलग दावे हैं। कोई कंपनी दावा करती है कि उसका एआई इंसानों से इंसानों की तरह बात करने में सक्षम है तो किसी का दावा है कि उसके द्वारा विकसित किया गया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कविता पाठ करने में सक्षम है और आर्ट भी बना सकता है, हालांकि इन दावों के बीच शोधकर्ताओं का कहना है कि टेक कंपनियां अपने एआई की क्षमताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही हैं जिससे बड़े स्तर पर गलतफहमी पैदा हो रही है। सिएटल के गैर-लाभकारी संस्था एलन इंस्टीट्यूट फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ओरेन एट्जियोनी कहते हैं कि एआई को लेकर हम संतुलन से बाहर हैं।

गूगल के चैटबॉट विवाद के बाद बढ़ी गलतफहमी

हाल ही में गूगल के एक डेवलपर ने दावा किया था उसके द्वारा तैयार किया गया चैटबॉट इंसानों की तरह संवेदनशील है। गूगल के इस चैटबॉट को लैम्डा (LaMDA) नाम दिया गया है। इसे डेवलप करने वाले इंजीनियर का दावा था कि इसने इंसानों की तरह सोचना शुरू कर दिया है। LaMDA को इस बात का डर भी सताने लगा है कि उसे डेवलप करने वाला इंजीनियर उसे किसी दिन बंद ना कर दे, हालांकि बाद में गूगल ने इंजीनियर को निलंबित कर दिया और दावे को खारिज कर दिया। गूगल के एक प्रवक्ता ब्रायन गेब्रियल ने कहा है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि लैम्डा संवेदनशील है, जबकि इसे डेवलप करने वाले इंजीनियर ब्लेक लेमोइन का मानना है कि लैम्डा के प्रभावशाली मौखिक कौशल के पीछे एक संवेदनशील दिमाग भी हो सकता है। ब्लेक लेमोइन ने ही चैटबॉट के साथ हुई चैटिंग को लीक किया था।
 

कहां हो रहा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सबसे ज्यादा इस्तेमाल

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल के दावों और वास्तविकता में बहुत बड़ा फर्क है। दावा है कि एआई इंसानों की तरह समझदार है, लेकिन सच्चाई यह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में कई तरह की तकनीकें शामिल हैं जो बड़े पैमाने पर गैर-सिनेमैटिक, बैक-ऑफिस लॉजिस्टिक्स और डाटा के लिए काम करती हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सबसे ज्यादा इस्तेमाल टारगेट विज्ञापन के लिए रहा है और सबसे ज्यादा इस्तेमाल गूगल, फेसबकु, इंस्टाग्राम, मेटा और ट्विटर के अलावा ई-कॉमर्स साइट कर रही हैं।

एआई के साथ भी इंसानों की तरह हैं दिक्कतें

हगिंग फेस नामक एक एआई स्टार्टअप में काम कर रही मिशेल और गूगल की एआई टीम को लीड करने वाली टिमनीत गेब्रू के मुताबिक एआई टेक्नोलॉजी कभी-कभी नुकसान पहुंचाती हैं, क्योंकि उनकी मानवीय क्षमताओं का मतलब है कि उनके पास भी इंसानों की तरह ही विफलता की संभावना है। इसे कुछ उदाहरणों से समझें तो फेसबुक की एआई के एक गलत अनुवाद के कारण एक फिलिस्तीनी व्यक्ति की गिरफ्तारी हो गई थी, क्योंकि फेसबुक के एआई ने "गुड मॉर्निंग" को अरबी में "उन्हें चोट पहुंचाई" और हिब्रू में "उन पर हमला" के रूप में अनुवाद किया था। पिछले साल प्रकाशित द फेसबुक फाइल्स सीरीज के हिस्से के रूप में द वॉल स्ट्रीट जर्नल का दावा है कि फेसबुक का एआई सिस्टम गोलीबारी वाले वीडियो में पहले व्यक्ति की पहचान करने में विफल रहा है।
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