अलीगढ़ः कांग्रेस का था जिले पर राज...2002 से नहीं चखा जीत का स्वाद

Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 30 Nov 2021 01:36 AM IST
Congress had rule over the district... did not taste victory since 2002
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अभिषेक शर्मा
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प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां तेज हैं। ऐसे में सियासी चकल्लस न होना बेमानी बात है। आज हम बात कर रहे हैं, प्रदेश में सियासी जमीन तैयार करने में जुटी कांग्रेस की। अपने जिले के इतिहास की सियासत पर गौर करें तो वो एक समय था, जब अलीगढ़ जनपद की सभी सीटों पर कांग्रेस का कब्जा हुआ करता था। आजादी के बाद के दो चुनावों के परिणाम कुछ यही बताते हैं। हालांकि आज पार्टी की एक भी सीट जिले में नहीं है। मगर, कांग्रेस को इस जिले में पहला झटका 1962 में एएमयू के प्रोफेसर रहे डॉ. बीपी मौर्य द्वारा तैयार किए गए दलित-मुस्लिम गठजोड़ से लगा और सिर्फ गंगीरी की एक सीट बाबू श्रीनिवास अपनी दम पर जीत सके। बात अगर मौजूदा दौर की करें तो 2002 के बाद से पार्टी ने जिले में जीत का स्वाद नहीं चखा है। जिले में शहर सीट से विवेक बंसल और इगलास से चौ.बिजेंद्र सिंह पार्टी के आखिरी बार जीत दर्ज करने वाले विधायक रहे हैं।
पहली बार ऐसे मिला झटका, राजा को हराया
बात 1962 के चुनाव की करें तो उससे पहले सब ठीक था। 1957 के चुनाव में जरूर कांग्रेस इगलास एकमात्र सीट हारी थी। मगर डॉ. बीआर आंबेडकर के निधन के बाद उनके बेहद करीबी डॉ. बीपी मौर्य ने डॉ. आंबेडकर द्वारा खड़ी की गई आरईपी यानि रिपब्लिकन पार्टी की कमान संभाली। डॉ. मौर्य खुद अनुसूचित वर्ग से आते थे। अपने जिले की खैर तहसील के रहने वाले थे और एएमयू में विधि विभाग में प्रोफेसर भी थे। उन्होंने कांग्रेस की जमीन दरकाने के लिए अपने जिले में दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर काम शुरू किया और 1962 में एक साथ हुए लोक सभा व विधानसभा चुनाव में वे सफल हुए। गंगीरी छोड़कर सभी सीटें कांग्रेस हारी। लोक सभा में भी मौर्य राजा महेंद्र प्रताप को चुनाव हराकर सांसद बने और उन्हें बाद में मंत्री भी बनाया। उनके इस गठजोड़ से कांग्रेस प्रभावित हुई और उन्हें इंदिरा गांधी ने कांग्रेस में शामिल कराया।

वापसी को जूझती कांग्रेस को इमरजेंसी से लगा झटका
1967 के चुनाव में बरौली से मोहनलाल गौतम इगलास शिफ्ट हुए और वहां जीत दर्ज की। इसी तरह खैर से नए जाट नेता प्यारेलाल पार्टी के टिकट पर विधायक बने। 1969 में सिर्फ शहर सीट जीत सकी। 74 के चुनाव में पार्टी ने कुछ वापसी का प्रयास कर कोल, बरौली और खैर सीट जीतीं। मगर इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए चुनाव में विपक्ष द्वारा जेल से बैठकर बनाई गई जेएनपी ने तगड़ा झटका दिया और सभी सातों सीटों पर कांग्रेस को हराया। इस हार के बाद पार्टी बेहद परेशान हुई।
इंदिरा कांग्रेस के दम पर वापसी, राम लहर में फिर हार
1980 में इंदिरा लहर में इंदिरा कांग्रेस के सहारे पार्टी ने जिले में अतरौली से कल्याण सिंह को हराकर और कोल, बरौली, खैर पर भी जीत दर्ज की। 1985 में भी गंगीरी, अलीगढ़ शहर व बरौली पर जीती। इसके बाद 89 में कोल व बरौली को जीता तो 1991 में एक बार फिर राम लहर के चलते सभी सीटों पर पार्टी चुनाव हारी।
सियासत के दिग्गज को हराकर कांग्रेस ने की वापसी
1993 का चुनाव यूपी की सियासत का बड़ा इतिहास कहा जाता है। जिले की इगलास सीट के कद्दावर जाट नेता व चौ.चरण सिंह के बेहद करीबी चौ.राजेंद्र सिंह को इस चुनाव में कांग्रेस सेवादल से जुड़े युवा जाट नेता चौ.बिजेंद्र सिंह ने हराकर जिले में अकेले जीत दर्ज की। कहा जाता है कि अगर वह चुनाव चौ.राजेंद्र सिंह न हारते तो वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। इस हार के बाद राजेंद्र सिंह ने सियासत से दूरी बना ली और चरण सिंह के वारिस अजित सिंह द्वारा मुलायम सिंह का समर्थन करने के कारण इन दोनों परिवारों में भी दूरी हो गई। इसी तरह 1996 के चुनाव में अकेले बरौली से दलवीर सिंह जीते।
85 के बाद 2002 में कांग्रेेस की शहर में वापसी
2002 का चुनाव कांग्रेस के लिए अपने जिले में आखिरी व ऐतिहासिक चुनाव भी रहा है। मुसलिमों के साथ-साथ हिंदू वोटों पर गहरी पैंठ रखने वाले उस समय के कांग्रेस के युवा नेता विवेक बंसल ने शहर सीट पर वापसी की। वे इस चुनाव को 1985 के बाद कांग्रेस के लिए जीते थे। इसी तरह कांग्रेस ने इस साल बिजेंद्र सिंह को लड़ाकर इगलास में भी जीता। मगर 2004 के चुनाव में बिजेंद्र सिंह के लोकसभा जाने के कारण इगलास भी कांग्रेस से बसपा के हाथ में चली गई। तब से कांग्रेस जिले में लगातार वापसी का प्रयास कर रही है।
ये भी एक नजर में जानें-
1951 का परिणाम : कोल सेंट्रल (शहर) से नफीसुल हसन, इगलास से श्यौदान सिंह, कोल से रामप्रसाद देशमुख, खैर-टप्पल-बरौली संयुक्त सीट से मोहनलाल गौतम, अतरौली नार्थ (गंगीरी अब छर्रा) से श्रीनिवास, अतरौली से राजाराम अरोरा, (सभी कांग्रेस के)।
1957 का परिणाम : टप्पल (खैर) से देवदत्त, अलीगढ़ से अनंतराम वर्मा, बरौली-जवां से मोहनलाल गौतम, कोल से रामप्रसाद देशमुख, गंगीरी से श्रीनिवास, अतरौली से नेकराम शर्मा (सभी कांग्रेस के)। इगलास में हारे।
1962 का परिणाम : गंगीरी से श्रीनिवास कांग्रेस। बाकी सभी सीटें हारे।
1967 का परिणाम : इगलास में मोहनल गौतम, खैर से प्यारे लाल कांग्रेस से। बाकी सीटें हारे।
1969 का परिणाम : शहर से अहमद लूथ खां कांग्रेस। बाकी सभी सीटें हारे।
1974 का परिणाम : कोल से पूरन चंद्र, बरौली से सुरेंद्र सिंह चौहान व खैर से प्यारेलाल कांग्रेस से जीते। चार सीटें हारे।
1977 का परिणाम : जिले की सातों सीटें कांग्रेस हारी।
1980 का परिणाम : अतरौली से अनवार खां, कोल से पूरनचंद्र, बरौली से सुरेंद्र सिंह चौहान, खैर से शिवराज सिंह कांग्रेस से जीते। तीन सीटें कांग्रेस हारी।
1985 का परिणाम : गंगीरी से तिलक सिंह, अलीगढ़ से कैप्टन बल्देव सिंह, बरौली से सुरेंद्र सिंह चौहान कांग्रेस से जीते। बाकी चार सीटें कांग्रेस हारी।
1989 का परिणाम : कोल से रामप्रसाद देशमुख व बरौली से सुरेंद्र सिंह चौहान कांग्रेस से जीते। बाकी पांच सीटें कांग्रेस हारी।
1991 का परिणाम: कांग्रेस सभी सीटों पर हारी।
1993 का परिणाम : इगलास से चौ.बिजेंद्र सिंह कांग्रेस से जीते। बाकी सीटें कांग्रेस हारी।
1996 का परिणाम : बरौली से ठा.दलवीर सिंह कांग्रेस से जीते। बाकी सीटें कांग्रेस हारी।
2002 का परिणाम : अलीगढ़ से विवेक बंसल व इगलास से बिजेंद्र सिंह कांग्रेस से जीते। बाकी सीटें कांग्रेस हारी।
2007, 2012 और 2017 के परिणाम : सभी सीटें कांग्रेस हारी।

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