Bareilly News: प्रतिष्ठा का प्रतीक बने सरकारी गनर, कई नेता निजी खर्च पर दिखा रहे भौकाल
सरकार ने कुछ साल पहले लाल बत्ती व हूटर हटाने का आदेश देकर वीआईपी कल्चर खत्म करने की कोशिश की थी। पेट्रोल-डीजल बचत के बहाने नेताओं ने काफिले में वाहनों की संख्या घटाकर मिसाल पेश की है, लेकिन सरकारी गनर साथ रखने का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं।
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सुरक्षा की ओट में सरकारी गनर प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गए हैं। इस पर हर महीने सरकार के लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। कई नेता निजी खर्च पर सरकारी गनर हासिल कर भौकाल दिखा रहे हैं। सरकारी खर्च को बचाने के लिए गनर लौटाने की हिम्मत अब तक किसी ने नही दिखाई है।
बरेली जिले में फिलहाल राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े 46 लोग सरकारी गनर लेकर चलते हैं। इनमें सांसद, विधायक, पूर्व विधायक, विभिन्न आयोग के सदस्य आदि शामिल हैं, जिनको सरकारी खर्च पर सुरक्षा दी गई है।
कई चर्चित नेताओं को भी मिले हैं सरकारी गनर
जिले के कई चर्चित नेताओं को भी सरकारी गनर मिले हैं। कई को प्रतिशत व्यय के हिसाब से गनर दिए गए हैं। विधानसभा व निकाय चुनाव नजदीक देख कई छुटभैये नेता भी सरकारी गनर साथ रखकर माहौल बना रहे हैं। जान को खतरा बताकर गनर के लिए लगातार नए आवेदन भी आ रहे हैं। जिला व मंडल स्तरीय सुरक्षा समिति ने जांच के बाद सौ से ज्यादा आवेदन खारिज भी किए गए हैं। कुछ ने सौ फीसदी व्यय गनर की मांग की है, जिनकी पत्रावलियां शासन में विचाराधीन हैं।
46 नेताओं की सुरक्षा में 55 गनर
जिले के 46 नेताओं की सुरक्षा में 55 गनर लगाए गए हैं। जिले के दागी नेताओं और गैरजरूरी लोगों को भी सरकारी खर्च पर सुरक्षा दी जा रही है। कई लोगों को सरकारी गनर लेकर चलने का मौका इसलिए भी मिल रहा है क्योंकि वह किसी नेता या रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखते हैं।
ये नेता चुका रहे भारी भरकम कीमत
गनर का वेतन भले ही कम हो, लेकिन उसे किसी के साथ भेजने पर व्यव लगभग 1.37 लाख रुपये प्रति माह लगाया जाता है। सौ फीसदी व्यय पर गनर लेने वाले को यह रकम हर माह सरकारी खजाने में जमा करनी होती है। पचास फीसदी पर इसकी आधी रकम और दस फीसदी व्यय पर 13737 रुपये जमा करने होते हैं। क्यारा ब्लॉक प्रमुख के पति अरविंद चौहान गनर का सौ फीसदी व्यय जमा करते हैं। भाजपा नेता अनिल शर्मा, सुरेश गंगवार व ब्लॉक प्रमुख शेरगढ़ भूपेंद्र कुमार 50 फीसदी खर्च जमा करते हैं।
ऐसे होती है तैनाती
जिला स्तरीय समिति (डीएम-एसएसपी व सीओ एलआईयू) किसी आवेदन को उचित मानकर संबंधित को एक-एक महीने तक वानी अधिकतम तीन महीने के लिए सुरक्षाकर्मी दे सकती है। मंडल स्तरीय समिति (कमिश्नर-डीआईजी और एसपी इंटेलिजेंस) किसी को तीन-तीन महीने करके अधिकतम नौ माह तक सुरक्षा मुहैया करा सकती है। इससे आगे सुरक्षा जारी रखने का निर्णय शासन स्तर से लिया जाता है।
एसएसपी अनुराग आर्य ने बताया कि किसी नेता या वीआईपी को कितना खतरा है, उसका आकलन करने के बाद ही गनर दिए जाते हैं। गनर व्यय का प्रतिशत भी सुरक्षा व जरूरत के आधार पर तय किया जाता है। हाल ही में कई गैर जरूरी गनर वापस बुलाए गए हैं। कई नए आवेदनों को निरस्त भी किया गया है।