मजबूरी ने लगा दिए हुनर को पंख...अब मुफलिसी को मात दे रही आधी आबादी

Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 21 Sep 2021 01:14 AM IST
रमजानपुर मव कालीन बुनती महिलाएं। संवाद
रमजानपुर मव कालीन बुनती महिलाएं। संवाद - फोटो : BADAUN
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कादरचौक (बदायूं)। आत्मनिर्भर भारत और आर्थिक रूप से सशक्त हो रही आधी आबादी का हौसला देखना है तो इलाके के रमजानपुर गांव आ जाइए। यहां की महिलाओं को जब मजबूरियों ने मुफलिसी से दो-चार कर दिया तो कालीन और जरी उद्योग से जुड़कर उन्होंने अपने हालात बदल दिए। अब वे हुनरमंद हो गईं हैं। मलाल बस इतना है कि जिस उम्र में हाथों में कलम होनी चाहिए थी, पेट की जरूरत ने उन हाथों में कैंची और धागे पकड़ा दिए।
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रमजानपुर कादरचौक ब्लॉक की सबसे बड़ी ग्राम पंचायतों में शुमार है। मुस्लिम बाहुल्य इस गांव की आबादी लगभग 25 हजार है। ज्यादातर परिवारों के मुखिया आसपास या बाहर मजदूरी करते हैं। घर की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर रहती है।

गृहस्थी चलाने और पुरुषों का सहयोग करने के लिए यहां पहले कुछ घरों में कालीन बनाने का काम शुरू हुआ। वर्तमान में यहां लगभग समूह के माध्यम और निजी स्तर से करीब 150 परिवार कालीन और जरी जरदोजी से जुड़ गए हैं। घरों की लड़कियां और महिलाएं इस काम में लगकर न सिर्फ घर का खर्च चला रही हैं बल्कि इस हुनर से वे अपने छोटे-छोटे सपने भी पूरे कर रही हैं।
गांव निवासी फराह व रेशमा बताती हैं कि ठेकेदारों से उन्हें काम मिलता है। कालीन बनाने की मजदूरी वर्ग फुट के हिसाब से होती है। एक वर्ग फुट के 300 से 350 रुपये तक मिल जाते हैं। एक उम्दा कालीन बनाने में तीन से चार महीने तक लग जाते हैं। कई बार तो 24 में 16 घंटे तक लगातार काम करना होता है। बताती हैं कि जितनी मेहनत कर लेते हैं, उतना ही फायदा होता है। कई घरों में लड़कियां कालीन बुनती हैं और मजदूरी से घर चलाती हैं। कम उम्र में काम करने से ज्यादातर लड़कियों की पढ़ाई शुरू नहीं हो पाती है।
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मेहनत के मुकाबले मजदूरी कम
जानकार बताते हैं कि 10 गुणा आठ फुट का कालीन तैयार करने में ढाई से तीन माह लग जाते हैं। वह भी तब जब दो-तीन लड़कियां (कारीगर) लगभग 15 से 18 घंटे काम करें। एक कालीन तैयार करके उन्हें 15 से 20 हजार रुपये मजदूरी मिल जाती है लेकिन मेहनत के मुकाबले यह बेहद कम है। रेशमा बताती हैं कि नक्शे के हिसाब से डिजायन तैयार किया जाता है। धागे काटने से उसका काफी हिस्सा उड़कर सांस के साथ पेट में चला जाता है, जिससे कई बार दिक्कत हो जाती है। काम बीच में रुकता है तो उसे समय पर पूरा करना मुश्किल होता है। जिस दिन कालीन तैयार होता है उसी दिन ठेकेदार इसे मशीन से काटकर ले जाते हैं। यह कालीन जयपुर में ऊंचे दामों पर बेचे जाते हैं। बताते हैं कि जयपुर से इन्हें जर्मनी व पश्चिमी देशों में निर्यात किया जाता है और इनकी कीमत लाखों में हो जाती है। कोरोना काल में कालीन की मांग विदेशों में और बढ़ी है।
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टेक्सटाइल अधिकारी ने दिया मदद का आश्वासन
सप्ताह भर पहले वस्त्र मंत्रालय भारत सरकार के हस्तशिल्प विकास केंद्र के टेक्सटाइल अधिकारी जेपी सिंह ने चांद मियां के सहयोग से गांव में शिल्पियों की बैठक कर उन्हें मंत्रालय की तरफ से कार्ड वितरण किए। साथ ही हरसंभव मदद का भरोसा दिया। कहा-आर्टीजन कार्ड बनने के बाद ये लोग शिल्पी भारत सरकार के कारीगर कहलाएंगे।
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कारीगर बोलीं-काम के हिसाब से पैसा नहीं मिलता
बच्चों का पालन पोषण करने को कालीन का करोबार शुरू किया था। घर पर ही स्वरोजगार मिल जाता है। बस काम के हिसाब से पैसा नहीं मिलता।
- रुपजहां
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नौ महीने दिन रात मेहनत कर पांच लड़कियों नें कालीन तैयार किया जिसका एक लाख रुपया मिला। घर चलाने को घर में ही रोजगार मिलना अच्छी बात है पर कारीगरी को कम रुपया ही मिल पाता है।
- नूर निशा
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हस्तशिल्प उद्योग अगर कारीगरों की मदद करे तो कारोबार बहुत प्रगति कर सकता है। बिना संसाधन के हम लोग काम करते हैं। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
- नाजिश
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कपड़ा मंत्रालय से आए अधिकारी ने हाल ही में गांव में काम को देखा है। उम्मीद है कि सरकारी मदद, बीमा और श्रम विभाग से योजनाओं का लाभ मिलेगा। पेंशन की व्यवस्था की जाए जिससे बुढ़ापे में काम न कर पाने पर भी सहायता मिले।
- तरन्नुम
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हमारे गांव की कई महिलाएं स्वयं सहायता समूह के जरिये तो कई निजी तौर पर कालीन व जरी कारीगर के रूप में काम कर रहीं हैं। उनकी हरसंभव मदद की जाएगी। अधिकारियों से संपर्क कर इन्हें रोजगार के और अवसर दिए जाएंगे। - सबा सिद्दीकी, प्रधान रमजानपुर

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