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हरदोईः मदारी के एका से हिल गई थी अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें

Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Thu, 11 Aug 2022 10:30 PM IST
फोटो-34-  मदारी पासी का बना स्मारक ।
फोटो-34- मदारी पासी का बना स्मारक । - फोटो : HARDOI
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हरदोई। तारीख 17 अक्तूबर 1920 प्रतापगढ़ के खारगांव में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में अवध किसान सभा का गठन किया गया। हरदोई व आसपास के जनपदों में किसान सभा का नेतृत्व मदारी पासी को सौंपा गया।

संगठन में असंतोष व्याप्त होने के बाद साल 1920 के आखिरी दिनों में मदारी पासी ने अवध किसान सभा से खुद को अलग कर लिया। इसके बाद उन्होंने जमीदारों व तालुकेदारों द्वारा किसानों से किए जा रहे अवैध कर वसूली व बेगारी के खिलाफ एका आंदोलन शुरू कर दिया।

देखते ही देखते यह आंदोलन अवध के लगभग सभी जिलों में फैल गया। सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, बहराइच, उन्नाव, फर्रुखाबाद व प्रतापगढ़ जिलों में लगातार एका की बैठकें होने लगीं।
क्रांतिवीर मदारी पासी कमेटी के अध्यक्ष रहे बाबा बचनू लाल बताते हैं कि एका आंदोलन 1921 के मध्य में चरम पर था। इस दौरान फरवरी 1921 में तीन दिनों में एका आंदोलन की 21 बैठकें हुईं।
इनमें दो हजार से भी ज्यादा किसानों ने भाग लिया था। इन बैठकों में मदारी पासी गंगाजल की एक पोटली और गीता या कुरान पकड़ा कर एक होकर रहने, ज्यादा टैक्स न देने और बेगारी मजदूरी न करने की कसम दिलाते थे।
एका आंदोलन की धमक से अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिल गईं। 1922 में एका आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजी शासन ने मदारी पासी को गिरफ्तार करने के लिए छापामारी शुरू कर दी।
काफी प्रयास के बाद भी मदारी पासी को पकड़ न पाने के बाद सरकार ने उन्हें फरार घोषित कर दिया। उनके घर की कुर्की कर ली गई। घर का सामान, गाय-बैल व 40 भैंसें सरकार ने जब्त कर जमीदार के मुख्तियार शंकर बक्स सिंह को दे दीं।
सरकार ने मदारी पासी पर एक हजार रुपये का इनाम घोषित कर दिया। बताते हैं कि मदारी पासी को पकड़ने के लिए सरकार ने दो हजार पुलिस के जवानों का दस्ता भेजा था। 1927 में मदारी पासी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
मदारी को कोर्ट से पांच माह की जेल हुई थी। 1928 में जेल से छूटने के बाद मदारी गांव पहुंचे तो वहां का मंजर बदल चुका था। फरारी और जेल के दौरान पुलिस में एका के सदस्यों को तमाम तरह से प्रताड़ित कर जेल में डाल दिया।
पुलिस के आतंक से मदारी के पुत्र हरी और ईश्वरदीन लखनऊ के नौबस्ता स्थित अपने बहनोई के घर जाकर रहने लगे थे। एका अब बिखर चुका था। मदारी का पुश्तैनी घर मलबे में तब्दील हो चुका था।
इसके बाद उन्होंने गांव से करीब एक किलोमीटर दूर अटरिया डीह पर एक कुटिया बना कर अपना जीवन यापन शुरू कर दिया। इस दौरान सरकार ने अवैध कर वसूली, बेगारी, हाथीवान, घोड़ा वान व मोटर वान जैसे अनुचित टैक्स रोक लगा दी।
साल 1930 में 70 वर्ष की आयु में जन नायक मदारी पासी का निधन हो गया। आंदोलन के 100 साल बीत जाने के बाद भी अटरिया डीह पर क्रांतिवीर मदारी पासी के लगाए गए इमली और पकरिया के पेड़ राहगीरों को छाया दे रहे हैं।
दो फूल को तरस रहा क्रांतिवीर का स्मारक
बाबा बचनू लाल बताते हैं कि करीब 20 साल पहले दिल्ली में संग्रहित अंग्रेजी शासन के दौर के अखबारों में मदारी पासी की खबरें पढ़कर तत्कालीन आईपीएस आरपी सरोज अटरिया डीह आए थे।
उनकी प्रेरणा से क्रांतिवीर मदारी पासी कमेटी का गठन किया गया। इसके बाद ग्रामीणों की मदद से मदारी पासी का स्मारक स्थल बनवाया गया। 2012 में बसपा सरकार के अंतिम दौर में एमएलसी अब्दुल हन्नान व सांसद अशोक रावत ने यहां सोलर लाइट लगवाई थी।
2019 में मुंबई के सेठ मिठाईलाल ने स्मारक पर टाइल्स लगवाया था। वह बताते हैं कि सरकार के साथ साथ लोगों ने भी अब इस महान क्रांतिकारी को बिसार दिया है। राष्ट्रीय पर्व पर इस क्रांतिवीर का स्मारक स्थल दो फूल को भी तरसता है।
मदारी के प्रपौत्र श्रीराम की दो माह पहले मौत हो गई। उनके पुत्र राजेश गांव के कोटेदार हैं। उनकी मांग है कि सरकार स्मारक स्थल के जीर्णोद्धार के साथ ही मदारी पासी के नाम से डिग्री कॉलेज खुलवाए।
सिर पर चारपाई रखकर बैठक में जाते थे मदारी
साल 1860 में भारी बारिश के बाद सर्दियां जल्दी शुरू हो गईं थी। दशहरा के दिन अतरौली के मोहनखेड़ा गांव में किसान मोहन पासी के घर में किलकारी गूंजी। पुरोहित ने बेटे का नाम मदारी रखा। मदारी के जन्म के तीन साल बाद भाई लक्ष्मण का जन्म हुआ।
मदारी को कुश्ती का शौक था। उन्होंने धनुष बाण, तलवार और भाला चलाना भी सिख लिया। शुरुआत से ही शोषण के विरुद्ध वह मुखर थे। एका की बैठकों के दौरान वह सिर पर अपनी चारपाई और सत्तू-पिसान बांधकर बैठक में जाते थे।
अमित शाह ने जनसभा में हरदोई को कहा था मदारी पासी की धरती
28 दिसंबर 2021 को विधानसभा चुनाव के प्रचार में हरदोई के राजकीय इंटर कॉलेज मैदान में जनसभा को संबोधित करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने हरदोई को मदारी पासी की धरती कहकर अपना संबोधन शुरू किया था।
राजनीतिक फायदे लेने के अलावा कभी किसी राजनीतिक पार्टी व नेताओं ने अदम्य साहस के प्रतीक मदारी पासी के गौरवशाली इतिहास को सहेजने का प्रयास नही किया।
बाबा बचनू लाल बताते हैं कि 2012 में सांसद अशोक रावत ने मदारी पासी के नाम पर टिकट जारी करने की मांग लोकसभा में की थी। इसके बाद किसी ने ध्यान नही दिया। जिले में पासी समाज के दो सांसद, तीन विधायक व जिला पंचायत अध्यक्ष हैं, लेकिन मदारी पासी का स्मारक स्थल उपेक्षा का शिकार है।
पीढ़ियां और मुक्ति संग्राम में अमर हैं मदारी
अमृतलाल नागर के ऐतिहासिक उपन्यास पीढियां और अयोध्या सिंह के ग्रंथ मुक्ति संग्राम में मदारी पासी अमर हैं। इनमें मदारी पासी व एका आंदोलन का वर्णन किया गया है। पूर्व आईपीएस आरपी सरोज ने क्रांतिवीर मदारी पासी एवं एका आंदोलन पुस्तक लिखी है।

फोटो-35- जानकारी देते बाबा बचनूलाल ।

फोटो-35- जानकारी देते बाबा बचनूलाल ।- फोटो : HARDOI

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