उन बुजुर्गों की आत्मा को शांति कैसे मिले, जिनके बच्चे जिंदा में ही माता-पिता को तिलांजलि दे रहे

Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Tue, 21 Sep 2021 01:29 AM IST
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झांसी। पितृ पक्ष शुरू हो चुके हैं। इन दिनों घर-घर लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध और मृतकों का पिंडदान कर उनकी आत्मा की शांति के हवन पूजन कर रहे हैं, लेकिन उन बुजुर्गों का क्या, जिनकी औलादें जिंदा में ही अपने माता-पिता को तिलांजलि दे रही हैं। उम्र के जिस पड़ाव में बुजुर्ग माता-पिता को बेटे-बहुओं और नाती-पोतों का साथ और सहारा चाहिए, उस उम्र में वह बेसहारा वृद्धाश्रम में अपने दिन काटने को मजबूर हैं।
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आईटीआई के पास स्थित वृद्धाश्रम में रहने वाले ऐसे तमाम बुजुर्ग हैं जिनके बच्चों ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया। इनमें कई तो खुद ही वृद्धाश्रम की चौखट तक आ पहुंचे और कई को उनके अपने ही छोड़ गए। इनके दिलों में बच्चों के साथ रहने की हसरत जहां अक्सर आंख से आंसू बनकर टपकती दिखती है। वहीं यह सवाल भी करती है कि मरने वालों की याद में श्राद्ध और कर्मकांड करने की तो परंपरा चली आ रही है, लेकिन वह बुजुर्ग क्या करें जिनके बच्चे उनके मरने से पहले ही उनसे मुंह मोड़ चुके हैं...।

वर्षों से बीमार पत्नी संग वृद्धाश्रम में कट रहे दिन, किससे बांटें अपना दुख
झांसी के सिंचाई विभाग में जेईटी के पद पर रहे 78 वर्ष के प्रमोद कुमार आज अपनी पत्नी सुशीला देवी (72) के साथ वृद्धा आश्रम में दिन काट रहे हैं। प्रमोद कुमार बताते हैं उनकी तीन बेटियां हैं। तीनों शादीशुदा हैं। सात-आठ वर्ष पहले एक दिन पत्नी अचानक बीमार हो गईं तो मानो उनका सुख चैन छिन गया। दिमाग की नसें सिकुड़ने से पत्नी मानसिक रूप से अक्षम हो चुकी है। वह बताते हैं कि बच्चों की तरह जिद करना, शोर मचाना और कहीं भी गंदगी कर देने से घर में आए दिन परेशानी होने लगी तो वह पत्नी को लेकर वृद्धाश्रम आ गए। अब उनके अपने घर में एक बेटी अपने बेटे के साथ रहती है। बेटी और नाती की परवरिश का जिम्मा भी उन पर ही है, जबकि वह पांच वर्षों से पत्नी के साथ वृद्धाश्रम में रहकर दिन रात उसकी सेवा में लगे हैं। वह बताते हैं कि पत्नी और नाती के प्यार के सहारे उनकी जिंदगी चल रही है। पेंशन का पैसा जयपुर से चल रहे पत्नी के इलाज और नाती की पढ़ाई में खर्च होता है। उन्होंने भारी मन से कहा कि बुढ़ापे में वह अपना दुख किसी से नहीं बांट सकते हैं।
बेटों ने घर में नहीं रखा तो दर-दर की ठोकरें खाने के बाद वृद्धाश्रम पहुंच गए पति-पत्नी
झांसी के रहने वाले ज्वाला प्रसाद और उनकी पत्नी रामदेवी ऐसे माता-पिता हैं जिनकी औलादों ने उन्हें बुढ़ापे में दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया। कोरोना काल में मां-बाप को घर से निकलना पड़ा। पिछले एक साल से वृद्धाश्रम में रह रहे ज्वाला प्रसाद बताते हैं कि उनके दो शादीशुदा बेटे हैं। वह खराद का काम करते थे। बेटे भी वही काम करते हैं। जब बेटों ने घर में रहने की जगह नहीं दी तो मजबूरन उन्हें पत्नी के साथ वृद्धाश्रम आना पड़ा। बेटों से मिलने की इच्छा में वह दोनों पति-पत्नी दिन रात रोते हैं, वह कई बार बेटों से मिलने भी चले जाते हैं लेकिन घर पर कोई उनसे बात तक नहीं करता। कभी कोई फोन करके हालचाल तक नहीं लेता है।
जिसको बुढ़ापे की लाठी बनाया उसी बेटे ने पैर तोड़कर घर से बेघर कर दिया
इकलौता बेटा बुढ़ापे में सहारे की लाठी बनेगा, यह सोचकर देवेंद्र सिंह ने अपना पूरा जीवन बेटे की परवरिश में लगा दिया, लेकिन उन्हें क्या पता था कि बुढ़ापे में वही बेटा उन्हें ही लाठियों से पीटकर घर से बेघर कर देगा। वृद्धाश्रम में 15 दिन पहले ही आए दतिया के भांगुर गांव निवासी देवेंद्र बताते हैं कि उनके पास पांच बीघा खेत और अपना मकान है। हंसी-खुशी बेटे की शादी की लेकिन अब बेटे ने उन्हें ही मारपीट कर घर से बाहर निकाल दिया। बेटा उन्हें खाना तक नहीं देता था। वह पूरा दिन भूखे रहते थे। उनकी पत्नी घर में दिन भर काम करने के बाद भी बदतर जिंदगी जी रही है। उन्होंने बताया कि वह अपनी पत्नी को भी वृद्धाश्रम लाना चाहते हैं। देवेंद्र सिंह ने बताया कि बेटे की पिटाई से उनका एक पैर भी टूट चुका है, वह लाठी से सहारे थोड़ा बहुत ही चल पाते हैं।
वृद्धा आश्रम में आने वाले हर एक बुजुर्ग की अपनी पीड़ा है। उन्हें उनके दुख से उबारने के लिए हर संभव प्रयास किए जाते हैं।
अनुराधा चौहान-प्रबंधक, वृद्धा आश्रम
बुजुर्ग अपने दुख से बाहर निकलें इसके लिए तीज-त्योहारों पर आयोजन कराए जाते हैं, सब साथ बैठकर त्योहार मनाते हैं।
प्रमोद शर्मा-सह प्रबंधक, वृद्धा आश्रम

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