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Bageshwar News: प्रकृतिक इंजीनियर-डॉक्टर ऊदबिलाव का जीवन खतरे में
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
Updated Tue, 26 May 2026 11:12 PM IST
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बागेश्वर। हर साल मई के अंतिम बुधवार को विश्व ऊदबिलाव दिवस मनाया जाता है। प्रकृति के इंजीनियर और डॉक्टर जैसे उपनाम वाले इस जीव का अस्तित्व संकट में है। परिस्थितिकी तंत्र के स्वस्थ होने का संकेत देने वाले इस जीव को बचाने के लिए ठोस उपाय भी नहीं किए जा रहे हैं।
ऊदबिलाव अर्धजलीय स्तनधारी प्राणी है। यह जमीन पर आवास बनाता है और भोजन के लिए नदियों पर निर्भर रहता है। यह नदियों में मछलियों और जलीय जीवों की आबादी को नियंत्रित करता है। कमजोर और बीमार शिकार को पकड़कर खाद्य श्रृंखला का संतुलन बनाए रखता है। नदी किनारे और जलचर जैव विविधता को स्वस्थ रखने में भूमिका निभाता है। इनकी मौजूदगी साफ पानी और नदी के प्रदूषण मुक्त होने का संकेत देती है। हालांकि, विकास की दौड़ में नदियां प्रदूषण मुक्त नहीं रह गई हैं। नदियों के दूषित होने का असर इनके जीवन पर पड़ रहा है। इनकी मौजूदगी बताती है कि नदी का पानी अपेक्षाकृत स्वच्छ है। प्रदूषणमुक्त और भरपूर मछलियां होने के कारण नदी का पारिस्थितिकी तंत्र अभी जीवित और संतुलित है।
जिले में 25 से 30 के बीच की आबादी का अनुमान
प्रदूषण से जिले की नदियां भी सुरक्षित नहीं हैं। 20-25 साल पहले तक नदियों में भारी संख्या में मछलियों के साथ कुछ ऊदबिलाव भी दिख जाते थे। अब हालात बदल चुके हैं। रेंजर श्याम सिंह करायत बताते हैं कि आखेट के कारण भी ऊदबिलाव का जीवन संकट में आया। वर्तमान में जिले में 25 से 30 के बीच ही इनकी संख्या होने का अनुमान हैं। मुख्य रूप से गरुड़ गंगा और कनलगढ़ नदी में मिलते हैं। सरयू, गोमती समेत अन्य नदियों के उद्गम सथल में इनके होने का अनुमान हैं। आबादी वाले क्षेत्रों में इनकी मौजदूगी का पुख्ता प्रमाण नहीं है।
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इनसेट
विश्वभर में 13, देश में तीन प्रजातियां
भारतीय वन्य जीव अनुसंधान संस्थान देहरादून के वैज्ञानिक/शोधकर्ता डॉ. विपुल मौर्या बताते हैं कि विश्वभर में ऊदबिलाव की 13 प्रजातियां ज्ञात हैं। हमारे देश में तीन प्रजातियां स्मूद कोटेड, यूरेशियन और स्मॉल क्लॉड ऊदबिलाव पाए जाते हैं। इनमें स्मूद-कोटेड ऊदबिलाव सबसे अधिक हैं। प्रदेश की रामगंगा, कोसी और खोह नदियों में इनके मिलने का प्रमाण है। हिमालयी तंत्र में इनकी स्थिति की जानकारी बेहद सीमित है। उन्होंने बताया कि जलविद्युत परियोजनाओं, अवैध खनन, प्रदूषण, विनाशकारी मत्स्य आखेट की तकनीकें और शिकार जैसे मानव जनित दबाव इनके जीवन के लिए गंभीर संकट बन गए हैं।
क्यों मनाते हैं ऊदबिलाव दिवस
ऊदबिलाव दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के इस प्रहरी जीव को संरक्षित करने के लिए लोगों को जागरूक करना है। आज के दिन अंतरराष्ट्रीय ऊदबिलाव संरक्षण कोष और दुनिया भर के वन्यजीव संगठन 50 से अधिक देशों में सेमिनार, नदी सफाई अभियान और अन्य जागरूकता कार्यक्रम करते हैं।
ऊदबिलाव अर्धजलीय स्तनधारी प्राणी है। यह जमीन पर आवास बनाता है और भोजन के लिए नदियों पर निर्भर रहता है। यह नदियों में मछलियों और जलीय जीवों की आबादी को नियंत्रित करता है। कमजोर और बीमार शिकार को पकड़कर खाद्य श्रृंखला का संतुलन बनाए रखता है। नदी किनारे और जलचर जैव विविधता को स्वस्थ रखने में भूमिका निभाता है। इनकी मौजूदगी साफ पानी और नदी के प्रदूषण मुक्त होने का संकेत देती है। हालांकि, विकास की दौड़ में नदियां प्रदूषण मुक्त नहीं रह गई हैं। नदियों के दूषित होने का असर इनके जीवन पर पड़ रहा है। इनकी मौजूदगी बताती है कि नदी का पानी अपेक्षाकृत स्वच्छ है। प्रदूषणमुक्त और भरपूर मछलियां होने के कारण नदी का पारिस्थितिकी तंत्र अभी जीवित और संतुलित है।
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जिले में 25 से 30 के बीच की आबादी का अनुमान
प्रदूषण से जिले की नदियां भी सुरक्षित नहीं हैं। 20-25 साल पहले तक नदियों में भारी संख्या में मछलियों के साथ कुछ ऊदबिलाव भी दिख जाते थे। अब हालात बदल चुके हैं। रेंजर श्याम सिंह करायत बताते हैं कि आखेट के कारण भी ऊदबिलाव का जीवन संकट में आया। वर्तमान में जिले में 25 से 30 के बीच ही इनकी संख्या होने का अनुमान हैं। मुख्य रूप से गरुड़ गंगा और कनलगढ़ नदी में मिलते हैं। सरयू, गोमती समेत अन्य नदियों के उद्गम सथल में इनके होने का अनुमान हैं। आबादी वाले क्षेत्रों में इनकी मौजदूगी का पुख्ता प्रमाण नहीं है।
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भारतीय वन्य जीव अनुसंधान संस्थान देहरादून के वैज्ञानिक/शोधकर्ता डॉ. विपुल मौर्या बताते हैं कि विश्वभर में ऊदबिलाव की 13 प्रजातियां ज्ञात हैं। हमारे देश में तीन प्रजातियां स्मूद कोटेड, यूरेशियन और स्मॉल क्लॉड ऊदबिलाव पाए जाते हैं। इनमें स्मूद-कोटेड ऊदबिलाव सबसे अधिक हैं। प्रदेश की रामगंगा, कोसी और खोह नदियों में इनके मिलने का प्रमाण है। हिमालयी तंत्र में इनकी स्थिति की जानकारी बेहद सीमित है। उन्होंने बताया कि जलविद्युत परियोजनाओं, अवैध खनन, प्रदूषण, विनाशकारी मत्स्य आखेट की तकनीकें और शिकार जैसे मानव जनित दबाव इनके जीवन के लिए गंभीर संकट बन गए हैं।
क्यों मनाते हैं ऊदबिलाव दिवस
ऊदबिलाव दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के इस प्रहरी जीव को संरक्षित करने के लिए लोगों को जागरूक करना है। आज के दिन अंतरराष्ट्रीय ऊदबिलाव संरक्षण कोष और दुनिया भर के वन्यजीव संगठन 50 से अधिक देशों में सेमिनार, नदी सफाई अभियान और अन्य जागरूकता कार्यक्रम करते हैं।