प्रदेश के सबसे बड़े और बाघों की नर्सरी कहे जाने वाले रणथंभौर टाइगर रिजर्व में अब बाघों की निगरानी अत्याधुनिक तकनीक की मदद से की जा सकती है। रणथंभौर वन प्रशासन ने बाघों की मॉनिटरिंग को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए जीएसएम कैमरों और सैटेलाइट कॉलर तकनीक के उपयोग की कार्ययोजना तैयार कर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण से अनुमति मांगी है।
यदि एनटीसीए से मंजूरी मिल जाती है तो रणथंभौर में बाघों की गतिविधियों पर रियल टाइम निगरानी रखी जा सकेगी। इससे न केवल बाघों की सुरक्षा और ट्रैकिंग मजबूत होगी, बल्कि वन अधिकारियों और कर्मचारियों की लगातार फील्ड मॉनिटरिंग की आवश्यकता भी कम हो जाएगी।
बढ़ती बाघ संख्या के साथ बढ़ी निगरानी की चुनौती
रणथंभौर टाइगर रिजर्व में लगातार बाघों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में कई सब-एडल्ट बाघ नई टेरिटरी की तलाश में रिजर्व क्षेत्र से बाहर निकल जाते हैं। कई बार ये बाघ धौलपुर, करौली और अन्य क्षेत्रों तक पहुंच जाते हैं, जिससे उनकी ट्रैकिंग वन विभाग के लिए चुनौती बन जाती है।
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हालांकि वर्तमान में रणथंभौर में सर्विलांस सिस्टम और थर्मल कैमरों के माध्यम से बाघों की निगरानी की जाती है, लेकिन इसके बावजूद कुछ बाघ रिजर्व की सीमा से बाहर निकल जाते हैं। विशेष रूप से परिधीय क्षेत्रों में विचरण करने वाले सब-एडल्ट बाघों की निगरानी करना कठिन होता है। रणथंभौर के डीएफओ मानस सिंह के अनुसार एनटीसीए से अनुमति मिलने के बाद प्रारंभिक चरण में रिजर्व की परिधि में विचरण करने वाले 8 से 10 बाघों को सैटेलाइट कॉलर से जोड़ा जाएगा और विभिन्न स्थानों पर जीएसएम कैमरे लगाए जाएंगे।
क्या हैं जीएसएम कैमरे?
जीएसएम कैमरे अत्याधुनिक वायरलेस सर्विलांस कैमरे होते हैं, जो इंटरनेट या वाई-फाई के बजाय सीधे मोबाइल नेटवर्क (सिम कार्ड) के माध्यम से संचालित होते हैं। इन्हें 4G और 5G सिम कैमरे भी कहा जाता है।
इन कैमरों से मोबाइल नेटवर्क के जरिए लाइव डेटा ट्रांसमिशन, दूरस्थ क्षेत्रों में भी प्रभावी निगरानी, रात में भी उच्च गुणवत्ता की रिकॉर्डिंग और मोबाइल एप के माध्यम से लाइव फुटेज देखने की सुविधा मिल सकेगी। इस सबसे आगे इन कैमरों में सोलर पैनल से चार्ज होने वाली बैटरी होने से चार्जिंग की परेशानी भी दूर होगी। इन कैमरों के जरिए वन अधिकारी कार्यालय में बैठकर भी बाघों की गतिविधियों पर नजर रख सकेंगे। इससे कैमरों तक बार-बार पहुंचने की आवश्यकता नहीं होगी।
सैटेलाइट कॉलर से मिलेगी सटीक लोकेशन
सैटेलाइट कॉलर के माध्यम से बाघों की लोकेशन और मूवमेंट की सटीक जानकारी मिल सकेगी। इससे रिजर्व क्षेत्र से बाहर निकलने वाले बाघों की निगरानी आसान होगी और उनके आवागमन के सुरक्षित मार्गों की पहचान भी की जा सकेगी। वन विभाग का मानना है कि इस तकनीक से बाघों के प्राकृतिक कॉरिडोर विकसित करने में भी मदद मिलेगी। साथ ही बाघों के मूवमेंट का एक विस्तृत वैज्ञानिक डेटा भी तैयार किया जा सकेगा।
रणथंभौर बन सकता है पहला ऐसा टाइगर रिजर्व
यदि एनटीसीए इस प्रस्ताव को मंजूरी देता है तो रणथंभौर टाइगर रिजर्व राजस्थान का पहला ऐसा टाइगर रिजर्व बन सकता है, जहां बाघों की निगरानी बड़े स्तर पर जीएसएम कैमरों और सैटेलाइट तकनीक के माध्यम से की जाएगी। फिलहाल वन विभाग को एनटीसीए की मंजूरी का इंतजार है। अनुमति मिलने के बाद यह परियोजना प्रदेश में वन्यजीव संरक्षण और बाघ मॉनिटरिंग के क्षेत्र में एक नई पहल साबित हो सकती है।