अहमद फ़राज़ के शेर

उर्दू के मक़बूल शायर के कलाम 

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अहमद फ़राज़

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम 

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मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर
ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ 

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अहमद फ़राज़

सिलवटें हैं मिरे चेहरे पे तो हैरत क्यूँ है
ज़िंदगी ने मुझे कुछ तुम से ज़ियादा पहना

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जब भी दिल खोल के रोए होंगे
लोग आराम से सोए होंगे

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