अमर उजाला काव्य डेस्क
दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं
उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया
- दाग़ देहलवी
ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुतृ
दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत
- मीर तक़ी मीर
किसी रईस की महफ़िल का ज़िक्र ही क्या है
ख़ुदा के घर भी न जाएँगे बिन बुलाए हुए
- अमीर मीनाई
तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया
- बहादुर शाह ज़फ़र
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
- मिर्ज़ा ग़ालिब
Urdu Poetry: तितली के लिए चुनिंदा शेर