अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
यूँ रात गए किस को सदा देते हैं अक्सर
वो कौन हमारा था जो वापस नहीं आया
- क़मर अब्बास क़मर
आ ही पहुँची इक दरीचे से शुआ'-ए-आफ़्ताब
मैं ये समझा था शब-ए-ग़म की सहर कोई नहीं
- दौलत राम साबिर पानीपती
मुद्दत से ख़्वाब में भी नहीं नींद का ख़याल
हैरत में हूँ ये किस का मुझे इंतिज़ार है
- शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ख़्वाबों पर इख़्तियार न यादों पे ज़ोर है
कब ज़िंदगी गुज़ारी है अपने हिसाब में
- फ़ातिमा हसन
Urdu Poetry: हमें न रोक कि घर जाना चाहते हैं हम