Urdu Poetry: ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली   

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आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे
- मिर्ज़ा ग़ालिब 

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मैं तो 'मुनीर' आईने में ख़ुद को तक कर हैरान हुआ
ये चेहरा कुछ और तरह था पहले किसी ज़माने में
- मुनीर नियाज़ी 

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जो उन मासूम आँखों ने दिए थे
वो धोके आज तक मैं खा रहा हूँ
- फ़िराक़ गोरखपुरी 

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कौन कहे मा'सूम हमारा बचपन था
खेल में भी तो आधा आधा आँगन था
- शारिक़ कैफ़ी 

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Urdu Poetry: दिया है जिस ने तुम जैसे को दिल उस का जिगर देखो

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