अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ
- उबैदुल्लाह अलीम
मेरी रुस्वाई के अस्बाब हैं मेरे अंदर
आदमी हूँ सो बहुत ख़्वाब हैं मेरे अंदर
- असद बदायूंनी
ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
- अहमद फ़राज़
ग़म है न अब ख़ुशी है न उम्मीद है न यास
सब से नजात पाए ज़माने गुज़र गए
- ख़ुमार बाराबंकवी
Urdu Poetry: पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा