Urdu Poetry: कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया
- जौन एलिया

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सच है एहसान का भी बोझ बहुत होता है
चार फूलों से दबी जाती है तुर्बत मेरी
- जलील मानिकपुरी

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यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला
किसी को हम न मिले और हम को तू न मिला
- ज़फ़र इक़बाल 

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कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
- बहादुर शाह ज़फ़र 

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Urdu Poetry: है ख़ुशी इंतिज़ार की हर दम

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