Urdu Poetry: पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब ओ हुनर
पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा
- बहादुर शाह ज़फ़र 

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मिरे सूरज आ! मिरे जिस्म पे अपना साया कर
बड़ी तेज़ हवा है सर्दी आज ग़ज़ब की है
- शहरयार 

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कटी है उम्र बस ये सोचने में
मिरे बारे में वो क्या सोचता है
- फ़हमी बदायूंनी 

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किसी के होने न होने के बारे में अक्सर
अकेले-पन में बड़े ध्यान जाया करते हैं
- जमाल एहसानी 

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Urdu Poetry: सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए

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