Urdu Poetry: मैं जागता हूँ तिरा ख़्वाब देखने के लिए

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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हर एक रात को महताब देखने के लिए
मैं जागता हूँ तिरा ख़्वाब देखने के लिए
- अज़हर इनायती

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ज़ोर क़िस्मत पे चल नहीं सकता
ख़ामुशी इख़्तियार करता हूँ
- अज़ीज़ हैदराबादी  

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जो चुप रहा तो वो समझेगा बद-गुमान मुझे
बुरा भला ही सही कुछ तो बोल आऊँ मैं
- इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी 

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आज फिर चाय बनाते हुए वो याद आया
आज फिर चाय में पत्ती नहीं डाली मैं ने
-तरुणा मिश्रा 

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Urdu Poetry: कहते हैं जिस को जन्नत वो इक झलक है तेरी

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