अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
एक ऐसा भी वक़्त होता है
मुस्कुराहट भी आह होती है
- जिगर मुरादाबादी
साया है कम खजूर के ऊँचे दरख़्त का
उम्मीद बाँधिए न बड़े आदमी के साथ
- कैफ़ भोपाली
मैं अब किसी की भी उम्मीद तोड़ सकता हूँ
मुझे किसी पे भी अब कोई ए'तिबार नहीं
- जव्वाद शैख़
हमेशा तिनके ही चुनते गुज़र गई अपनी
मगर चमन में कहीं आशियाँ बना न सके
- मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
Urdu Poetry: एक तख़्ती अम्न के पैग़ाम की टाँग दीजे ऊँचे मीनारों के बीच