अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया
- साहिर लुधियानवी
दर्द ऐसा है कि जी चाहे है ज़िंदा रहिए
ज़िंदगी ऐसी कि मर जाने को जी चाहे है
- कलीम आजिज़
अपने जैसी कोई तस्वीर बनानी थी मुझे
मिरे अंदर से सभी रंग तुम्हारे निकले
- सालिम सलीम
दरवाज़े को बंद न रखना
घर में जाला पड़ जाता है
- इक़बाल असलम
दौलत से कहाँ जुड़ते हैं टूटे हुए रिश्ते
शीशे को कभी गोंद से जोड़ा नहीं जाता
- मेहवर नूरी
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
- अहमद फ़राज़
Urdu Poetry: तू ग़मों का मेरे इलाज कर मिरी बात सुन तू अभी न जा