Urdu Poetry: मुझ को अख़बार सी लगती हैं तुम्हारी बातें

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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मुझ को अख़बार सी लगती हैं तुम्हारी बातें
हर नए रोज़ नया फ़ित्ना बयाँ करती हैं
- बशीर महताब 

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अज़ल से क़ाएम हैं दोनों अपनी ज़िदों पे 'मोहसिन'
चलेगा पानी मगर किनारा नहीं चलेगा
- मोहसिन नक़वी

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न जाने कौन सी मंज़िल पे इश्क़ आ पहुँचा
दुआ भी काम न आए कोई दवा न लगे
- अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

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मुझ को अब कैसे पा सकेगा कोई
वक़्त था और गुज़र गया हूँ मैं
- शारिक़ जमाल

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Urdu Poetry: कैसे होते हैं वो ख़त जिन के जवाब आते हैं

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