अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तमाम उम्र ख़ुशी की तलाश में गुज़री
तमाम उम्र तरसते रहे ख़ुशी के लिए
- अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
अपना घर आने से पहले
इतनी गलियाँ क्यूँ आती हैं
- मोहम्मद अल्वी
दिल ने तमन्ना की थी जिस की बरसों तक
ऐसे ज़ख़्म को अच्छा कर के बैठ गए
- ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
ऐ ग़म-ए-दुनिया तुझे क्या इल्म तेरे वास्ते
किन बहानों से तबीअ'त राह पर लाई गई
- साहिर लुधियानवी
आज भी बुरी क्या है कल भी ये बुरी क्या थी
इस का नाम दुनिया है ये बदलती रहती है
- एजाज़ सिद्दीक़ी
लकीरें खींच के मिट्टी पे बैठ जाता हूँ
यहाँ मकाँ था ये बाज़ार ये गली उस की
- अशरफ़ यूसुफ़ी
Urdu Poetry: मुद्दत से ख़्वाब में भी नहीं नींद का ख़याल