Urdu Poetry: जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता
- वसीम बरेलवी

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इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं
आने वाले बरसों ब'अद भी आते हैं
- ज़ेहरा निगाह

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क़स्र-ए-दिल कुछ इस क़दर टूटा हुआ है एहतमाम
उन के बस इक लम्स भर से ख़ाक में मिल जाए गा
- एहतमाम सादिक़

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अब इस घर की आबादी मेहमानों पर है
कोई आ जाए तो वक़्त गुज़र जाता है
- ज़ेहरा निगाह

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भीड़ तन्हाइयों का मेला है
आदमी आदमी अकेला है
- सबा अकबराबादी

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दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
- मिर्ज़ा ग़ालिब

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Urdu Poetry: जो पूरे होने से रह गए थे वो ख़्वाब रक्खे हुए हैं घर में

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