Urdu Poetry: अंधेरों को निकाला जा रहा है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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अंधेरों को निकाला जा रहा है
मगर घर से उजाला जा रहा है
- फ़ना निज़ामी कानपुरी

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कहीं कोई चराग़ जलता है
कुछ न कुछ रौशनी रहेगी अभी
- अबरार अहमद

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अँधेरे छू नहीं सकते हैं मुझ को
कि मेरे साथ तेरी रौशनी है
- शारिब लखनवी

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नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है
ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे
- शकील बदायूंनी 

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शाम से पहले तिरी शाम न होने दूँगा
ज़िंदगी मैं तुझे नाकाम न होने दूँगा
- साबिर ज़फ़र

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शाम पड़ते ही किसी शख़्स की याद
कूचा-ए-जाँ में सदा करती है
 परवीन शाकिर

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Urdu Poetry: ज़िंदगी आवाज़ है बातें करो बातें करो

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