अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता
- ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
जिस की ख़ातिर मैं भुला बैठा था अपने आप को
अब उसी के भूल जाने का हुनर भी देखना
- अताउल हक़ क़ासमी
तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर
सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर
- अमीर मीनाई
तुम नहीं पास कोई पास नहीं
अब मुझे ज़िंदगी की आस नहीं
- जिगर बरेलवी
Urdu Poetry: फूल ही फूल याद आते हैं आप जब जब भी मुस्कुराते हैं