Urdu Poetry: अंधेरा है कैसे तिरा ख़त पढ़ूँ लिफ़ाफ़े में कुछ रौशनी भेज दे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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अंधेरा है कैसे तिरा ख़त पढ़ूँ
लिफ़ाफ़े में कुछ रौशनी भेज दे
- मोहम्मद अल्वी 

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उसे बेचैन कर जाऊँगा मैं भी
ख़मोशी से गुज़र जाऊँगा मैं भी
- अमीर क़ज़लबाश

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चुप चुप क्यूँ रहते हो 'नासिर'
ये क्या रोग लगा रक्खा है
- नासिर काज़मी

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ग़म मुझे देते हो औरों की ख़ुशी के वास्ते
क्यूँ बुरे बनते हो तुम नाहक़ किसी के वास्ते
- रियाज़ ख़ैराबादी

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Urdu Poetry: न जाने कौन सी मंज़िल पे इश्क़ आ पहुँचा

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