अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
रोने वालों से कहो उन का भी रोना रो लें
जिन को मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया
- सुदर्शन फ़ाकिर
ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ
- उबैदुल्लाह अलीम
आँखें खुलीं तो जाग उठीं हसरतें तमाम
उस को भी खो दिया जिसे पाया था ख़्वाब में
- सिराज लखनवी
दर्द ओ ग़म दिल की तबीअत बन गए
अब यहाँ आराम ही आराम है
- जिगर मुरादाबादी
Urdu Poetry: सो अब अपनी ज़िंदगी में नए ख़्वाब भर रहे हैं