Urdu Poetry: बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली   

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बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करें जो काम न बे-दिल-लगी चले
- शेख़ इब्राहीम ज़ौक़  

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ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई
- मुज़फ़्फ़र रज़्मी

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सदा ऐश दौराँ दिखाता नहीं
गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं
- मीर हसन

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हर-चंद ए'तिबार में धोके भी हैं मगर
ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए
- जाँ निसार अख़्तर 

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Urdu Poetry: वो एक शख़्स जो दिल को दुआ सा लगता है

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