अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हर एक रात को महताब देखने के लिए
मैं जागता हूँ तिरा ख़्वाब देखने के लिए
- अज़हर इनायती
आँखें खुलीं तो जाग उठीं हसरतें तमाम
उस को भी खो दिया जिसे पाया था ख़्वाब में
- सिराज लखनवी
मिल गए थे एक बार उस के जो मेरे लब से लब
'उम्र भर होंटों पे अपने मैं ज़बाँ फेरा किया
- जुरअत क़लंदर बख़्श
बस जान गया मैं तिरी पहचान यही है
तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता
- अकबर इलाहाबादी
इन चराग़ों में तेल ही कम था
क्यूँ गिला फिर हमें हवा से रहे
- जावेद अख़्तर
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक
- मिर्ज़ा ग़ालिब
Urdu Poetry: क़रार दिल को सदा जिस के नाम से आया