अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कोई मंज़िल के क़रीब आ के भटक जाता है
कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से
- क़सरी कानपुरी
अपनी क़िस्मत में सभी कुछ था मगर फूल न थे
तुम अगर फूल न होते तो हमारे होते
- अशफ़ाक़ नासिर
लिक्खा है जो तक़दीर में होगा वही ऐ दिल
शर्मिंदा न करना मुझे तू दस्त-ए-दुआ का
- आग़ा हज्जू शरफ़
मैं भी इक मौज हूँ मेरा भी मुक़द्दर है सफ़र
कैसे साहिल पे खड़े रह के समुंदर देखूँ
- राना नाहीद राना
या तेरे अलावा भी किसी शय की तलब है
या अपनी मोहब्बत पे भरोसा नहीं हम को
- शहरयार
ऐ अदम के मुसाफ़िरो होशियार
राह में ज़िंदगी खड़ी होगी
- साग़र सिद्दीक़ी
Urdu Poetry: आसमाँ अपने इरादों में मगन है लेकिन