अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
जितनी बटनी थी बट चुकी ये ज़मीं
अब तो बस आसमान बाक़ी है
- राजेश रेड्डी
बदले हुए से लगते हैं अब मौसमों के रंग
पड़ता है आसमान का साया ज़मीन पर
- हमदम कशमीरी
बना रहा हूँ मैं फ़ेहरिस्त छोटे लोगों की
मलाल ये कि बड़े नाम इस में आते हैं
- एजाज़ तवक्कल
कुछ इंसाँ थे कुछ मज़हब थे एक ख़ुदा था
और उस एक ख़ुदा के कारन सब झगड़ा था
- इंद्र मोहन मेहता कैफ़
सच ये है हम ही मोहब्बत का सबक़ पढ़ न सके
वर्ना अन-पढ़ तो न थे हम को पढ़ाने वाले
- अनवर जमाल अनवर
बस जान गया मैं तिरी पहचान यही है
तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता
- अकबर इलाहाबादी
Urdu Poetry: कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से