अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
जंग का शोर भी कुछ देर तो थम सकता है
फिर से इक अम्न की अफ़्वाह उड़ा दी जाए
- शाहिद कमाल
तुझ से मैं जंग का एलान भी कर ही दूँगा
मेरे दुश्मन तू मिरे क़द के बराबर तो आ
- नदीम गुल्लानी
तमाम शहर से मैं जंग जीत सकता हूँ
मगर मैं तुम से बिछड़ते ही हार जाऊँगा
-- एजाज़ अंसारी
तुम मोहब्बत को खेल कहते हो
हम ने बर्बाद ज़िंदगी कर ली
- बशीर बद्र
अब मिरी कोई ज़िंदगी ही नहीं
अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या
- जौन एलिया
दर्द ऐसा है कि जी चाहे है ज़िंदा रहिए
ज़िंदगी ऐसी कि मर जाने को जी चाहे है
- कलीम आजिज़
Urdu Poetry: आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर