अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
'जमाल' हर शहर से है प्यारा वो शहर मुझ को
जहाँ से देखा था पहली बार आसमान मैं ने
- जमाल एहसानी
लकीरें खींच के मिट्टी पे बैठ जाता हूँ
यहाँ मकाँ था ये बाज़ार ये गली उस की
- अशरफ़ यूसुफ़ी
फूलों को सुर्ख़ी देने में
पत्ते पीले हो जाते हैं
- फ़हमी बदायूंनी
कुछ फूलों की ख़ातिर भी कुछ फूलों का
सब से अच्छा रंग चुराना पड़ता है
- नदीम भाभा
दिल को बहुत अज़ीज़ है आना बसंत का
'रहबर' की ज़िंदगी में समाना बसंत का
- जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
मुझ से बिगड़ गए तो रक़ीबों की बन गई
ग़ैरों में बट रहा है मिरा ए'तिबार आज
- अहमद हुसैन माइल
Urdu Poetry: फिर से इक अम्न की अफ़्वाह उड़ा दी जाए