अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला
किसी को हम न मिले और हम को तू न मिला
- ज़फ़र इक़बाल
मक़्बूल हों न हों ये मुक़द्दर की बात है
सज्दे किसी के दर पे किए जा रहा हूँ मैं
- जोश मलसियानी
जो चल पड़े थे अज़्म-ए-सफ़र ले के थक गए
जो लड़खड़ा रहे थे वो मंज़िल पे आए हैं
- हैरत सहरवर्दी
क़ब्रों में नहीं हम को किताबों में उतारो
हम लोग मोहब्बत की कहानी में मरें हैं
- एजाज़ तवक्कल
सब किताबों के खुल गए मअ'नी
जब से देखी 'नज़ीर' दिल की किताब
- नज़ीर अकबराबादी
कुछ तो महफ़ूज़ रखिए सीने में
ज़िंदगानी खुली किताब न हो
- फ़ारूक़ इंजीनियर
Urdu Poetry: हम ने घर की सलामती के लिए