अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तुम ने सिर्फ़ चाहा है हम ने छू के देखे हैं
पैरहन घटाओं के जिस्म बर्क़-पारों के
- साहिर लुधियानवी
झूट था जो भी किया था मैं ने
और जो तुम ने कहा था क्या था
- शरर फ़तेह पुरी
हम तोहफ़े में घड़ियाँ तो दे देते हैं
इक दूजे को वक़्त नहीं दे पाते हैं
- फ़रीहा नक़वी
मीठी बातें, कभी तल्ख़ लहजे के तीर
दिल पे हर दिन है उन का करम भी नया
- क़ैसर ख़ालिद
मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे
न दवा याद रहे और न दुआ याद रहे
- शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
दिल मोहब्बत से भर गया 'बेख़ुद'
अब किसी पर फ़िदा नहीं होता
- बेख़ुद देहलवी
Urdu Poetry: अँधेरे छू नहीं सकते हैं मुझ को