अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मैं मरीज़ हूँ तिरे हिज्र का ज़रा हाथ में मिरा हाथ ले
तू ग़मों का मेरे इलाज कर मिरी बात सुन तू अभी न जा
- अर्पित शर्मा अर्पित
छपी थी जिस की ग़ज़ल में ज़माने भर की ख़ुशी
ख़ुद उस की ज़ीस्त का नग़्मा अज़ाब सा उभरा
- अब्दुल मतीन जामी
क़िस्मत तो देख टूटी है जा कर कहाँ कमंद
कुछ दूर अपने हाथ से जब बाम रह गया
- क़ाएम चाँदपुरी
ख़ुश-नसीबी में है यही इक ऐब
बद-नसीबों के घर नहीं आती
- रसा जालंधरी
दौलत नहीं काम आती जो तक़दीर बुरी हो
क़ारून को भी अपना ख़ज़ाना नहीं मिलता
- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
कुछ वो जिन्हें हम से निस्बत थी उन कूचों में आन आबाद हुए
कुछ अर्श पे तारे कहलाए कुछ फूल बने जा गुलशन में
- इब्न-ए-इंशा
Urdu Poetry: हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल