Urdu Poetry: इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे
- अहमद फ़राज़

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काश वो रास्ते में मिल जाए
मुझ को मुँह फेर कर गुज़रना है
- फ़हमी बदायूंनी 

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उस ना-ख़ुदा के ज़ुल्म ओ सितम हाए क्या करूँ
कश्ती मिरी डुबोई है साहिल के आस-पास
- हसरत मोहानी

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कुछ और सबक़ हम को ज़माने ने सिखाए
कुछ और सबक़ हम ने किताबों में पढ़े थे
- हस्तीमल हस्ती

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बारहा तेरा इंतिज़ार किया
अपने ख़्वाबों में इक दुल्हन की तरह
- परवीन शाकिर

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ऐ ग़म-ए-ज़िंदगी न हो नाराज़
मुझ को आदत है मुस्कुराने की
- अब्दुल हमीद अदम 

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