Urdu Poetry: गुज़रे जो अपने यारों की सोहबत में चार दिन

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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गुज़रे जो अपने यारों की सोहबत में चार दिन
ऐसा लगा बसर हुए जन्नत में चार दिन
- ए जी जोश  

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आरज़ू है कि तू यहाँ आए
और फिर उम्र भर न जाए कहीं
- नासिर काज़मी

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मिरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है
तुम्हारे साथ मिल कर ख़ुद को धोना चाहता हूँ मैं
- फ़रहत एहसास

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ये इंतिक़ाम है या एहतिजाज है क्या है
ये लोग धूप में क्यूँ हैं शजर के होते हुए
- हसीब सोज़ 

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