Urdu Poetry: इक तिरा ज़िक्र था और बीच में क्या क्या निकला

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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आरज़ू हसरत और उम्मीद शिकायत आँसू
इक तिरा ज़िक्र था और बीच में क्या क्या निकला
- सरवर आलम राज़  

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तू भी सादा है कभी चाल बदलता ही नहीं
हम भी सादा हैं इसी चाल में आ जाते हैं
- अफ़ज़ल ख़ान

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नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है
ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे
- शकील बदायूंनी 

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यार के आगे पढ़ा ये रेख़्ता जा कर 'नज़ीर'
सुन के बोला वाह-वाह अच्छा कहा अच्छा कहा
- नज़ीर अकबराबादी

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थक गया मैं करते करते याद तुझ को
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ
- क़तील शिफ़ाई

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इक सफ़ीना है तिरी याद अगर
इक समुंदर है मिरी तन्हाई
- अहमद नदीम क़ासमी

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वहशतें इश्क़ और मजबूरी
क्या किसी ख़ास इम्तिहान में हूँ
- ख़ुर्शीद रब्बानी

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Hindi Shayari: दर्द बरसात की बूँदों में बसा करता है

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