Urdu Poetry: इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं
आने वाले बरसों ब'अद भी आते हैं
- ज़ेहरा निगाह

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है ख़ुशी इंतिज़ार की हर दम
मैं ये क्यूँ पूछूँ कब मिलेंगे आप
- निज़ाम रामपुरी

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ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
- जाँ निसार अख़्तर

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खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही
जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है
- फ़िराक़ गोरखपुरी 

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Urdu Poetry: अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

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